Rajeev Sharma IMC Team

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स्वदेशी अपनाएं, देश बचाएं ।
आयुर्वेद अपनाएं, अपने आप को बचाएं ।

10/06/2026

आज चिकित्सा का पूरा ढांचा इस कदर सड़ चुका है कि इलाज के नाम पर सिर्फ एक संगठित डकैती चल रही है। अखबारों में आने वाली खबरें तो सिर्फ समंदर की ऊपरी सतह हैं, असली खेल तो अस्पतालों के बंद कमरों में खेला जाता है जहां मरीज को इंसान नहीं, बल्कि नोट उगलने वाली मशीन समझा जाता है।

सफेद कोट पहनने वाले ये लोग आज सेवा की कसमें भूलकर कॉर्पोरेट के ऐसे खूंखार सेल्समैन बन चुके हैं, जो अपनी जेबें भरने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

​इस घिनौने सिस्टम की सबसे काली करतूत यह है कि यहाँ बीमारी का इलाज नहीं किया जाता, बल्कि बीमारी को पाला जाता है ताकि मरीज बार-बार लौटकर आता रहे। मामूली सर्दी, खांसी या बदन दर्द लेकर जाने वाले इंसान को भी इस कदर डरा दिया जाता है कि वह अपनी जिंदगी की भीख मांगने लगता है।

इस सिस्टम का सबसे घिनौना हथियार है - 'डर'। मरीज और उसके तीमारदारों को इस कदर डरा दिया जाता है कि "अगर अभी ऑपरेशन नहीं किया तो कुछ भी हो सकता है।"

​नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है, लेकिन अस्पताल का बेड और सिजेरियन (C-Section) का बिल बनाने के लिए जबरन पेट काट दिया जाता है।

​वेंटिलेटर का खेल तो ऐसा है कि कई बार इंसान दम तोड़ चुका होता है, लेकिन सिर्फ रोज़ का 50 हज़ार का बिल बनाने के लिए लाश को भी वेंटिलेटर पर रखकर धड़कनें दिखाई जाती हैं।

इसी डर का फायदा उठाकर डॉक्टरों का पूरा गिरोह एक्टिव होता है। बिना किसी जरूरत के हजार-दो हजार के पर्चे पर ऐसी महंगी ब्रांडेड दवाइयां लिख दी जाती हैं, जिनका सीधा कमिशन डॉक्टरों के विदेशी दौरों और लग्जरी गाड़ियों के रूप में उनके पास पहुंचता है।

जांच के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह तो और भी गंदा है। एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई और खून की दर्जनों ऐसी महंगी जांचें जबरन थोप दी जाती हैं जिनकी रत्ती भर भी जरूरत नहीं होती। इन प्राइवेट लैब्स और डॉक्टरों का आधा-आधा कट (कमिशन) पहले से तय होता है।

आज कई प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टरों की काबिलियत इस बात से नहीं आंकी जाती कि उन्होंने कितने मरीज ठीक किए, बल्कि इस बात से तय होती है कि उन्होंने अस्पताल को कितना 'बिजनेस' दिया! डॉक्टरों को बकायदा मंथली टारगेट मिलते हैं।

​जो बीमारी दो टाइम की मामूली दवा से ठीक हो सकती है, उसके लिए पांच टाइम की भारी दवाइयां लिख दी जाती हैं।
​मामूली सिरदर्द या पेटदर्द लेकर जाइए, आपको डराकर तुरंत MRI, CT Scan और दुनिया भर के महंगे टेस्ट की कतार में खड़ा कर दिया जाएगा क्योंकि इन सभी टेस्ट में डॉक्टर का सीधा कट (कमिशन) बंधा होता है।

रात-ओ-रात करोड़पति बनने की इस अंधी दौड़ में इन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाले गरीब या मध्यमवर्गीय इंसान का घर बिक रहा है, उसकी पत्नी के गहने गिरवी रख रहे हैं या वह पूरी तरह सड़क पर आ रहा है।

नॉर्मल डिलीवरी को सिजेरियन में बदलना, मामूली ब्लॉकेज में जबरन स्टेंट ठोक देना और यहाँ तक कि वेंटिलेटर पर लाशों को रखकर रोज़ का लाखों का बिल बनाना, इस सिस्टम की वो काली हकीकतें हैं जिन्हें देखकर रूह कांप जाए।

​एक आम भारतीय परिवार जीवन भर मेहनत करके पाई-पाई जोड़ता है—बच्चों की पढ़ाई के लिए, बेटी की शादी के लिए या बुढ़ापे के लिए। लेकिन इस मेडिकल माफिया के चंगुल में अगर परिवार का एक भी सदस्य फंस गया,

तो चंद हफ्तों के भीतर ​घर के गहने बिक जाते हैं। ​जमीन और मकान गिरवी रख दिए जाते हैं। ​हंसता-खेलता परिवार चंद दिनों में सड़क पर (रोड पर) आ जाता है। आपकी पूरी जिंदगी की कमाई इन कॉर्पोरेट अस्पतालों के चमचमाते शीशों और डॉक्टरों के ठाठ-बाठ में बदल जाती है।

​लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह पूरा सिस्टम इतना गंदा और बेलगाम क्यों हो गया? इसके पीछे एक बहुत बड़ा और सोची-समझी साजिश वाला गेम प्लान है। देश में जानबूझकर डॉक्टरों की भारी कमी बनाए रखी गई है। मेडिकल सीटों को इतना सीमित और एमबीबीएस की पढ़ाई को इतना महंगा कर दिया गया है कि एक आम या गरीब मेधावी बच्चा डॉक्टर बनने का सपना भी नहीं देख सकता।

जब एक डॉक्टर बनने के लिए करोड़ रुपये डोनेशन और फीस के नाम पर फूंक दिए जाते हैं, तो डिग्री हाथ में आते ही उस डॉक्टर का एकमात्र मकसद उन करोड़ों रुपयों को ब्याज समेत जल्द से जल्द वसूलना होता है।

सिस्टम ने जानबूझकर ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है ताकि चुनिंदा लोगों का इस पेशे पर एकाधिकार (Monopoly) रहे। अगर सरकार वाकई जनता का भला चाहती, तो एमबीबीएस की पढ़ाई को इतना सस्ता और सुलभ बना देती कि हर गली-मोहल्ले में योग्य डॉक्टर तैयार होते। जब डॉक्टरों की संख्या बढ़ती, तो बाजार में कंपटीशन होता।

डॉक्टरों को मरीजों के सामने हाथ जोड़ना पड़ता, इलाज के दाम जमीन पर आते और हर आम इंसान को कौड़ियों के भाव सही इलाज मिल जाता। लेकिन ऐसा होने नहीं दिया जाता, क्योंकि अगर इलाज सस्ता हो गया तो इन कॉर्पोरेट अस्पतालों के आलीशान शीशे और फार्मा कंपनियों के अरबों के साम्राज्य ढह जाएंगे।

​यह न्यूज़ की कटिंग तो महज़ एक बानगी है, असली सच यह है कि पूरा मेडिकल माफिया मिलकर इस देश की जनता की रगों से खून की जगह उनका पैसा चूस रहा है। जब तक इस देश की शिक्षा प्रणाली और मेडिकल सीटों के इस खेल को नहीं बदला जाएगा, तब तक डॉक्टरों की यह कमी और उनकी यह अंधाधुंध लूट ऐसे ही जारी रहेगी।

आज मेडिकल का पेशा सेवा का माध्यम है या इंसानी मजबूरियों का फायदा उठाने वाला कत्लखाना? चंद रुपयों के लालच में मरीजों को दवा के नाम पर धीमा जहर और ओवरडोज परोसने वाले इन सेल्समैनों को बेनकाब करना ही होगा।

हमें इस सड़े हुए सिस्टम के बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाना होगा, वरना आज जो इलाज के नाम पर अपनी जमा-पूंजी लुटा रहे हैं, कल उनकी आने वाली पीढ़ियां सिर्फ अस्पताल की चौखट पर दम तोड़ने को मजबूर हो जाएंगी। इस कड़वे और आंखें खोल देने वाले सच को पहचानिए और इस लूटतंत्र के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद कीजिए।

हर डॉक्टर बुरा नहीं होता, आज भी कई डॉक्टर ईमानदारी से काम कर रहे हैं, लेकिन इस भ्रष्ट सिस्टम ने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है। जब तक आप सवाल नहीं उठाएंगे, तब तक आपकी जेब और जान दोनों लुटती रहेगी।


Sameer Saiyad

09/06/2026
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Photos from Rajeev Sharma IMC Team's post 08/06/2026

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