FAKE societ¥
get rid of anti social elements
कभी कभी ऐसा होता है कि आप अपने से उम्र में बड़े लोगों के व्यक्तिगत स्वभाव से अपरिचित होने के कारण उनके प्रति अपने मन में एक धारणा बना लेते हैं ये अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी लेकिन जब कभी आप किसी कारणवश उनके व्यक्तित्व से रूबरू होते हैं तब दो ही चीजें होती हैं, अगर सामनेवाले का व्यक्तित्व आपके सोच के हिसाब से है तो फिर कोई दिक्कत नहीं लेकिन अगर सामनेवाला आपकी सोच से भिन्न है तो फिर उसी वक्त से उस व्यक्ति के लिए आपकी धारणाएं भी बदलती रहती हैं
।लोग नहीं बदलते धारणाएं बदलतीं हैं।
हम सच क्यों नहीं बोल सकते,
क्या कभी सोचा है कि हम अंदर से इतने झूठे क्यों है ,
बाहर से तो हम ठीक-ठाक ही हैं,
क्या कभी सोचा है कि हर बात से इतने डरे हुए क्यों हैं
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