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10/06/2026
Government Approves Price Hike For Cisplatin And Carboplatin: ईरान और इजरायल- अमेरिका के बीच चल रहे तनाव का असर पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है. देश में खाने- पीने की चीजों से लेकर पेट्रोल- डीजल और गैस के दाम बढ़ रहे हैं और अब इसका असर दवाइयों पर भी देखने को मिल सकता है, जिससे कैंसर मरीजों को परेशानी हो सकती है. दरअसल, सरकार ने कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दो अहम दवाओं सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में विशेष बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है. इन दवाओं की देशभर में लगातार कमी देखी जा रही थी, जिससे कैंसर मरीजों के इलाज पर असर पड़ने लगा था.
देशभर में इसका असर
मामला इतना गंभीर हो गया था कि देश के प्रमुख कैंसर संस्थानों और अस्पतालों में भी इन दवाओं की उपलब्धता प्रभावित होने लगी. दिल्ली स्थित एम्स और मुंबई के टाटा मेमोरियल सेंटर जैसे संस्थानों ने भी इस कमी को लेकर चिंता जताई थी. डॉक्टरों का कहना है कि इन दवाओं का इस्तेमाल लंग्स, सिर और गर्दन, सर्वाइकल, ओवरी और टेस्टिकुलर कैंसर समेत कई प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है. खास बात यह है कि इनकी जगह इस्तेमाल करने के लिए कोई पूरी तरह समान विकल्प उपलब्ध नहीं है.
क्यों हो रही है दवाओं की कमी?
जानकारों के मुताबिक, दवाओं की कमी का सबसे बड़ा कारण प्लेटिनम की बढ़ती कीमतें हैं. प्लेटिनम वह मुख्य कच्चा माल है जिससे इन दवाओं का निर्माण किया जाता है. पिछले कुछ वर्षों में प्लेटिनम की कीमतों में 225 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है, जबकि बीते छह महीनों में ही इसकी कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है. दक्षिण अफ्रीका में उत्पादन संबंधी चुनौतियां और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है.
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सरकार ने क्यों बढ़ाई कीमत?
दूसरी ओर, इन दवाओं की कीमतें लंबे समय से सरकारी नियंत्रण में थीं. ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर के तहत निर्धारित मूल्य सीमा के कारण कंपनियां बढ़ती लागत के बावजूद दाम नहीं बढ़ा पा रही थीं. नतीजतन कई दवा कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया या कुछ मामलों में बंद भी कर दिया, जिससे बाजार में आपूर्ति प्रभावित हुई. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने डीपीसीओ 2013 के पैरा 19 का इस्तेमाल करने का फैसला किया है. यह एक विशेष प्रावधान है, जिसके तहत किसी आवश्यक दवा की उपलब्धता प्रभावित होने पर सरकार सामान्य मूल्य नियंत्रण नियमों से अलग फैसला ले सकती है. इसी प्रावधान के जरिए सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में संशोधन का रास्ता साफ हुआ है.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक समिति ने सिफारिश की है कि पिछली मूल्य निर्धारण तिथि के बाद हर साल 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी को आधार माना जा सकता है, जबकि कुल वृद्धि 50 प्रतिशत से अधिक न हो. हालांकि, कीमतों में अंतिम संशोधन का निर्णय दवा निर्माण लागत में हुई वास्तविक बढ़ोतरी के आंकड़ों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा.
इलाज में देरी हो सकती थी
एक्सपर्ट का मानना है कि यदि इन दवाओं की कमी लंबे समय तक बनी रहती, तो मरीजों के इलाज में देरी हो सकती थी. इससे कैंसर दोबारा लौटने का खतरा बढ़ने के साथ-साथ मरीजों की रिकवरी और जीवित रहने की संभावना पर भी असर पड़ सकता था. सरकार को उम्मीद है कि कीमतों में संशोधन के बाद घरेलू कंपनियां दोबारा बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करेंगी. इससे सप्लाई में सुधार होगा और कैंसर मरीजों को समय पर जरूरी दवाएं उपलब्ध हो सकेंगी.
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कैंसर मरीजों को लगा तगड़ा झटका, किल्लत की वजह से बढ़ाए जाएंगे इन दो दवाओं के दाम Essential Cancer Medicines: सरकार ने कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दो अहम दवाओं, सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में वि...
10/06/2026
Delhi Obesity Cases Decline In NFHS-6: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) 2023-24 की रिपोर्ट दिल्ली की हेल्थ स्थिति को लेकर चिंताजनक पेश किया है. रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी में मोटापे के मामलों में कमी दर्ज की गई है, लेकिन इसके साथ ही डायबिटीज, कुपोषण और बच्चों के पोषण से जुड़े कई मामले में स्थिति खराब नजर आई है. चलिए आपको बताते हैं कि रिपोर्ट में क्या बताया गया है और देश की राजधानी में किस बीमारी का खतरा अब बढ़ रहा है.
दिल्ली में कम हुआ मोटापा
सर्वे के अनुसार दिल्ली के पुरुषों में मोटापा कम हुआ है. देश की राजधानी में में पुरुषों का मोटापा दर पिछले NFHS-5 के 38.0 प्रतिशक से घटकर अब NFHS-6 में 34.8 प्रतिशत रह गया है. अगर महिलाओं की बात करें तो, 5 राज्यों में जिनमें महिलाओं में मोटापे के मामले कम देखे गए हैं उनमें दिल्ली का नाम शामिल है.पहली नजर में यह पॉजिटिव बदलाव लगता है, लेकिन हेल्थ का कहना है कि तस्वीर का दूसरा पक्ष ज्यादा चिंता बढ़ाने वाला है. रिपोर्ट बताती है कि डायबिटीज की दवा लेने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. महिलाओं में यह आंकड़ा 12 प्रतिशत से बढ़कर 19 प्रतिशत और पुरुषों में 14 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत हो गया है. यह स्थिति काफी चिंता करने वाली है.
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कुपोषण के मामले भी बढ़े
राजधानी में कुपोषण के मामले भी बढ़े हैं. महिलाओं में कुपोषण की दर 10 प्रतिशत से बढ़कर 12 प्रतिशत हो गई, जबकि पुरुषों में यह 9 प्रतिशत से बढ़कर 14.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि मोटापा कम होने का मतलब हमेशा बेहतर स्वास्थ्य नहीं होता. कई बार खराब खानपान, पोषण की कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी वजन में गिरावट देखने को मिल सकती है.
बच्चों के पोषण को लेकर भी चिंता
रिपोर्ट में बच्चों के पोषण को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है. जन्म के एक घंटे के भीतर ब्रेस्टफीडिंग शुरू कराने वाली माताओं की संख्या 51.2 प्रतिशत से घटकर 45.1 प्रतिशत रह गई है. वहीं छह महीने तक केवल मां का दूध पीने वाले शिशुओं का प्रतिशत 64.3 से घटकर 48.3 रह गया. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन पहले छह महीने तक केवल स्तनपान की सिफारिश करता है, क्योंकि इससे बच्चों को आवश्यक पोषण और बीमारियों से सुरक्षा मिलती है. बच्चों के पूरक आहार से जुड़े आंकड़े भी निराशाजनक हैं. छह से आठ महीने की उम्र के बच्चों को ब्रेस्टफीडिंग के साथ पूरक भोजन देने की दर 62.9 प्रतिशत से घटकर 52.5 प्रतिशत हो गई. वहीं 6 से 23 महीने के केवल 11.2 प्रतिशत बच्चों को ही न्यूनतम पर्याप्त आहार मिल रहा है, जो पहले 16 प्रतिशत था.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
दिल्ली में मोटापे के मामले घटे, लेकिन इन बीमारियों में इजाफा, NFHS-6 में खुलासा Child Nutrition In Delhi: राजधानी में मोटापे के मामलों में कमी दर्ज की गई है, लेकिन इसके साथ ही डायबिटीज, कुपोषण और बच्चों के पोषण स.....
10/06/2026
Polio Virus Detected In Ghaziabad Sewage Samples: गाजियाबाद में सीवेज के एक नमूने में वैक्सीन-डिराइव्ड पोलियोवायरस टाइप-1 मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड पर आ गया है. हालांकि अभी तक किसी बच्चे में पोलियो इंफेक्शन की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सीवेज में वायरस की मौजूदगी ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है. इसके बाद प्रभावित इलाकों में विशेष निगरानी और घर-घर सर्वे शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं.
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से हर महीने पानी के नमूने लेकर उनकी जांच कराता है. हाल ही में डुंडाहेड़ा एसटीपी से लिया गया नमूना जांच के लिए भेजा गया था, जिसकी रिपोर्ट में VDPV-1 स्ट्रेन की पुष्टि हुई. रिपोर्ट सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए.
12 इलाकों की जांच
अधिकारियों ने 12 शहरी क्षेत्रों में डोर-टू-डोर सर्वे शुरू करने का फैसला लिया है. इसके लिए 107 स्वास्थ्य टीमों को तैनात किया गया है. ये टीमें पांच साल तक के बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति, टीकाकरण रिकॉर्ड और किसी संभावित बीमारी के लक्षणों की जानकारी जुटाएंगी. सर्वे राजनगर, शास्त्री नगर, बुलंदशहर रोड इंडस्ट्रियल एरिया, दौलतपुरा, न्यू पंचवटी कॉलोनी, घुकना, हिंडन विहार, कैला भट्टा, मिर्जापुर, विजय नगर-1, विजय नगर-2 और खैराती नगर जैसे इलाकों में किया जाएगा. स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि नियमित टीकाकरण में कमी या कुछ बच्चों का वैक्सीन से छूट जाना इस वायरस के मिलने की एक बड़ी वजह हो सकती है. यही कारण है कि अब टीकाकरण कवरेज की भी समीक्षा की जा रही है. ताकि स्थिति का सही तरीके से पता लगाया जा सके और इसको फैलने से रोका जा सके.
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यह कंडीशन कितनी खतरनाक?
हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग की रिपोर्ट के अनुसार, पोलियो एक गंभीर वायरल बीमारी है, जो व्यक्ति से व्यक्ति में फैल सकती है. यह बीमारी इम्यून सिस्टम पर हमला करती है और गंभीर मामलों में स्थायी लकवा या जानलेवा स्थिति पैदा कर सकती है. हालांकि सीवेज में वायरस का मिलना सीधे तौर पर किसी प्रकोप की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि वायरस किसी स्तर पर समुदाय में मौजूद हो सकता है.
निगरानी का महत्वपूर्ण तरीका
दरअसल, सीवेज या वेस्टवॉटर की जांच सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है. इससे वायरस की मौजूदगी का पता उस समय भी चल सकता है, जब किसी व्यक्ति में बीमारी के लक्षण सामने न आए हों. एक्सपर्ट के अनुसार यदि समय रहते निगरानी और टीकाकरण को मजबूत नहीं किया गया तो वायरस संवेदनशील आबादी तक पहुंच सकता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
गाजियाबाद के सीवेज के सैंपल में मिला पोलियो वायरस, जानें यह कंडीशन कितनी खतरनाक? Vaccine-Derived Poliovirus: पोलियोवायरस टाइप-1 मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड पर आ गया है. हालांकि अभी तक किसी बच्चे में पोलि....
10/06/2026
Pfizer’s Berobenatide Weight Loss Drug: मोटापे और डायबिटीज के इलाज में एक बड़ा बदलाव आने की संभावना दिखाई दे रही है. दवा कंपनी फाइजर ने अपनी नई प्रायोगिक दवा बेरोबेनेटाइड के मिड-स्टेज ट्रायल के नतीजे जारी किए हैं. खास बात यह है कि यदि यह दवा भविष्य में मंजूरी हासिल कर लेती है, तो यह दुनिया की पहली ऐसी जीएलपी-1 आधारित वेट लॉस थेरेपी हो सकती है जिसे हर हफ्ते नहीं, बल्कि महीने में सिर्फ एक बार इंजेक्शन के रूप में लेना होगा.
इस तरह कैसे दी जाती है दवा?
मौजूदा समय में वेगोवी और जेडबाउंड जैसी लोकप्रिय वेट लॉस दवाएं साप्ताहिक इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं. इसके विपरीत ब्राबांटिया का उद्देश्य मरीजों के लिए इलाज को अधिक सुविधाजनक बनाना है. शुरुआती चरण में मरीजों को साप्ताहिक डोज दी जाएगी, जिसके बाद उन्हें महीने में केवल एक इंजेक्शन लेना होगा. इसका मतलब है कि सालभर में 52 इंजेक्शन की जगह केवल 12 इंजेक्शन की जरूरत पड़ेगी.
वेस्पर-3 नामक क्लिनिकल ट्रायल में डायबिटीज से पीड़ित न होने वाले प्रतिभागियों का वजन 12.3 प्रतिशत तक कम हुआ. दिलचस्प बात यह रही कि जो मरीज बाद में मासिक डोज पर गए, उनका वजन कम होना जारी रहा और वजन घटने की प्रक्रिया किसी ठहराव पर नहीं पहुंची.
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क्या इनके असर दिखते हैं?
हालांकि वेगोवी और जेडबाउंड जैसी दवाओं ने बड़े और लंबे स्टडी में लगभग 15 प्रतिशत और 20 प्रतिशत से अधिक वजन घटाने के परिणाम दिखाए हैं, लेकिनफोर्टिस सीडीओसी हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज के चेयरमैन और एम्स दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनूप मिश्रा का कहना है कि अलग-अलग ट्रायल्स के परिणामों की सीधी तुलना नहीं की जानी चाहिए.
क्या है इसकी खासियत?
डॉ. अनूप मिश्रा के अनुसार बेरोबेनेटाइड की सबसे बड़ी खासियत वजन घटाने का प्रतिशत नहीं, बल्कि इसकी मासिक डोजिंग है. उनका मानना है कि भारत जैसे देश में लंबे समय तक इलाज जारी रखना बड़ी चुनौती होता है. ऐसे में महीने में केवल एक बार इंजेक्शन लेने की सुविधा मरीजों की उपचार के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ा सकती है और इलाज छोड़ने की संभावना कम कर सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक अब इस दवा के फेज-3 ट्रायल्स पर नजर रहेगी. इसमें लंबे समय तक वजन कम रहने की क्षमता, सुरक्षा, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स, हार्ट और किडनी पर प्रभाव जैसे पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा. यह भी देखा जाएगा कि शरीर में पूरे महीने तक सक्रिय रहने वाली यह दवा किसी नए जोखिम को तो जन्म नहीं देती.
कब तक मार्केट में आ सकती है?
डॉ. मिश्रा का मानना है कि भविष्य में मोटापे के इलाज का फोकस केवल वजन घटाने तक सीमित नहीं रहेगा. हार्ट रोग, किडनी स्वास्थ्य, ब्लड शुगर कंट्रोल, दवा की कीमत और मरीज की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति जैसे कारक भी इलाज तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे. उनके अनुसार आने वाले वर्षों में लंबे समय तक असर करने वाली दवाएं, कॉम्बिनेशन थेरेपी और पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट मोटापे के इलाज की दिशा तय करेंगे. यदि यह अपने अंतिम ट्रायल्स में सफल रहती है, तो इसके 2028 के अंत या 2029 के मध्य तक मरीजों के लिए उपलब्ध होने की संभावना है. एक्सपर्ट मानते हैं कि यह दवा मोटापे को एक लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के रूप में प्रबंधित करने के तरीके को बदल सकती है.
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मोटापा कम करने का नया कमाल, 52 नहीं अब सिर्फ 12 इंजेक्शन में चलेगा काम, जानें कैसे? Monthly Weight Loss Injection: वेगोवी और जेडबाउंड जैसी दवाओं ने बड़े और लंबे स्टडी में लगभग 15 प्रतिशत और 20 प्रतिशत से अधिक वजन घटाने के ...
10/06/2026
Warning Signs Of Mental Health Problems: मेंटल हेल्थ आज भारत के सामने उभरती हुई सबसे बड़ी हेल्थ चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है. इसका गंभीर संकेत 2024 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों में भी देखने को मिला है. रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में वर्ष 2024 के दौरान 15,491 लोगों ने आत्महत्या की, यानी औसतन हर दिन 42 लोगों ने अपनी जान गंवाई. यह आंकड़ा सिर्फ एक अपराध या सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि गहराते मेंटल हेल्थ संकट की ओर भी इशारा करता है.
मेंटल हेल्थ क्यों चुनौती की तरह उभर रहा?
एक्सपर्ट का मानना है कि छात्रों और युवाओं में बढ़ता तनाव इस संकट का एक बड़ा कारण बनकर उभरा है. प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, करियर को लेकर अनिश्चितता और लगातार बढ़ती अपेक्षाएं युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं. आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश छात्र आत्महत्या के मामलों में देश में तीसरे स्थान पर है और राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली छात्र आत्महत्याओं में लगभग 10 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले इसी राज्य की है.
लड़कियों के मामले हैरान कर देने वाले
चिंताजनक बात यह है कि छात्राओं पर मानसिक दबाव का असर अधिक दिखाई दे रहा है. वर्ष 2024 में राज्य में 731 छात्राओं और 716 छात्रों ने आत्महत्या की. इसे बढ़ते शैक्षणिक दबाव, सामाजिक अपेक्षाओं और भावनात्मक तनाव से जोड़कर देखते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि आत्महत्या कभी भी अचानक लिया गया फैसला नहीं होता. इसके पीछे लंबे समय से चल रही मानसिक परेशानियां, डिप्रेशन, चिंता और इमोशनल संघर्ष छिपे हो सकते हैं. इसलिए शुरुआती संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है.
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क्या होते हैं इसके लक्षण?
अहमदाबाद स्थित एक निजी मनोचिकित्सा केंद्र की कंसलटेंट और 'हैप्पीनेस फर्स्ट' की एक्सपर्ट डॉ. विधि पटेल वैष्णव के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बार-बार मौत या आत्महत्या की बातें करने लगे, अत्यधिक चिंता और बेचैनी महसूस करे, खुद को निरर्थक समझने लगे, अचानक लोगों से दूरी बनाने लगे या अपनी प्रिय चीजें दूसरों को देने लगे, तो इसे गंभीर चेतावनी संकेत माना जाना चाहिए. ऐसे मामलों में तुरंत एक्सपर्ट की मदद लेना जरूरी है. डॉ का कहना है कि समय पर मेडिकल सहायता और इमोशनल सहयोग कई जिंदगियां बचा सकता है. अच्छी नींद, नियमित व्यायाम, परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करना, स्क्रीन टाइम कम करना और जीवन में संतोष की भावना विकसित करना मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है.
मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत
एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को गांव और छोटे शहरों तक पहुंचाना समय की जरूरत है. स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सुविधाएं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य एक्सपर्ट और जागरूकता अभियान इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
हर दिन 42 मौतें, डिप्रेशन और तनाव बना बड़ी चुनौती, एक्सपर्ट ने बताए ये शुरुआती लक्षण Depression Symptoms: रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में वर्ष 2024 के दौरान 15,491 लोगों ने आत्महत्या की, यानी औसतन हर दिन 42 लोगों ने अपनी...
10/06/2026
Monsoon Health Tips: मॉनसून में इन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा, इन 5 बातों का ख्याल रख अपनों को बचा सकते हैं आप
मॉनसून में इन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा, इन 5 बातों का ख्याल रख अपनों को बचा सकते हैं आप बारिश के दौरान घरों और आसपास जमा पानी मच्छरों के पनपने की सबसे बड़ी वजह बनता है. ऐसे में डेंगू और मलेरिया के मामले त.....
10/06/2026
Diabetes Care Tips: शुगर पेशेंट हैं तो आज से गांठ बांध लें ये 5 बातें, वरना वक्त से पहले आ जाएगी मौत
शुगर पेशेंट हैं तो आज से गांठ बांध लें ये 5 बातें, वरना वक्त से पहले आ जाएगी मौत डायबिटीज के मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज उनका खानपान है. अक्सर लोग दवा तो समय पर लेते हैं, लेकिन खाने-पीने में .....
10/06/2026
Does Eating Potatoes Really Cause Acidity: आलू भारतीय रसोई का ऐसा हिस्सा है जो लगभग हर घर में किसी न किसी रूप में खाया जाता है. लेकिन कई लोग आलू खाने के बाद पेट में जलन, गैस, भारीपन या एसिडिटी की शिकायत करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में आलू एसिडिटी बढ़ाता है या इसके पीछे कोई और वजह होती है? एक्सपर्ट के अनुसार ज्यादातर मामलों में समस्या आलू से नहीं, बल्कि उसे खाने के तरीके और व्यक्ति की पाचन क्षमता से जुड़ी होती है.
क्या सच में इससे गैस बनती है?
Ubiehealth की रिपोर्ट के अनुसार, आलू में रेजिस्टेंट स्टार्च पाया जाता है. यह एक प्रकार का स्टार्च है जो पूरी तरह पच नहीं पाता और बड़ी आंत तक पहुंच जाता है. वहां मौजूद बैक्टीरिया इसे फर्मेंट करते हैं, जिससे गैस बनने लगती है, कुछ लोगों में यही गैस पेट फूलने, भारीपन और एसिडिटी जैसे लक्षण पैदा कर सकती है खासकर जिन लोगों का डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिवहोता है, उन्हें यह समस्या ज्यादा महसूस हो सकती है.
किन लोगों को हो सकती है दिक्कत?
यदि आप इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या बार-बार होने वाली डाइजेशन संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं, तो ज्यादा मात्रा में आलू खाने से भी असहजता बढ़ सकती है. हालांकि आलू को सामान्य तौर पर पाचन के लिए सुरक्षित माना जाता है, लेकिन बड़ी मात्रा में इसका सेवन कुछ लोगों में गैस और पेट दर्द का कारण बन सकता है.
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कैसे सही तरीके से कर सकते हैं यूज?
आलू खाने का तरीका भी काफी मायने रखता है. उबले या बेक किए गए आलू आमतौर पर आसानी से पच जाते हैं, जबकि फ्रेंच फ्राइज, चिप्स या ज्यादा तेल-मसाले में बने आलू पेट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. तैलीय भोजन पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है, जिससे एसिडिटी और गैस की समस्या बढ़ सकती है. इसलिए यदि आलू खाने के बाद जलन महसूस होती है, तो सबसे पहले उसकी तैयारी के तरीके पर ध्यान देना चाहिए. एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि हरे रंग के या अंकुरित आलू खाने से बचना चाहिए. ऐसे आलू में सोलनाइन नामक नेचुरल टॉक्सिक तत्व की मात्रा बढ़ सकती है, जो पेट दर्द, मतली और पाचन संबंधी परेशानियों का कारण बन सकता है.
अगर आपको लगता है कि आलू खाने के बाद बार-बार एसिडिटी हो रही है, तो कुछ दिनों तक अपने खानपान का रिकॉर्ड रखें. ध्यान दें कि आपने आलू किस रूप में खाया, कितनी मात्रा में खाया और उसके बाद कौन से लक्षण दिखाई दिए. इससे सही कारण समझने में मदद मिल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
क्या सच में आलू खाने से एसिडिटी की दिक्कत होती है? जानें इसको खाने के सही तरीके Eating Potatoes Really Cause Acidity: लगभग हर घर में आलू किसी न किसी रूप में खाया जाता है. लेकिन कई लोग आलू खाने के बाद पेट में जलन, गैस, भारीप....
10/06/2026
Brain Tumor Risk Factors: ये चीजें आज ही कर दें अपनी लाइफ से दूर, ब्रेन ट्यूमर का खतरा बढ़ाते हैं जुबान को पसंद ये पदार्थ
ये चीजें आज ही कर दें अपनी लाइफ से दूर, ब्रेन ट्यूमर का खतरा बढ़ाते हैं जुबान को पसंद ये पदार्थ सबसे पहले बात करते हैं शुगर से भरपूर ड्रिंक्स की. कसार कई लोगों ये न्ही पता होता है की कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड जूस और ए....
09/06/2026
Early Warning Signs Of Ovarian Cancer In Women: भारत में महिलाओं के बीच ओवेरियन कैंसर तीसरा सबसे आम कैंसर माना जाता है. चिंता की बात यह है कि ज्यादातर महिलाओं को इसकी पहचान तब होती है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है. एक्सपर्ट के अनुसार भारत में करीब 70 से 80 प्रतिशत ओवेरियन कैंसर के मामले एडवांस स्टेज में सामने आते हैं. इसकी बड़ी वजह यह नहीं है कि बीमारी को पहले पकड़ा नहीं जा सकता, बल्कि इसके शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि उन्हें अक्सर किसी दूसरी समस्या समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
क्या इसके लक्षण पहले से पता नहीं चलते?
ऑन्कोलॉजिस्ट लंबे समय से ओवेरियन कैंसर को साइलेंट डिजीज कहते रहे हैं, लेकिन डॉ. संपदा देसाई ने TOI को बताया कि यह बीमारी पूरी तरह खामोश नहीं होती. उनके अनुसार ओवेरियन कैंसर साइलेंट कैंसर जरूर कहलाता है, लेकिन यह कम संकेत देता है. इसके लक्षण अक्सर बहुत सामान्य होते हैं और ज्यादातर डाइजेशन से जुड़ी समस्याओं जैसे लगते हैं. संपदा देसाई बताती हैं कि जल्दी पेट भर जाना, लगातार पेट फूलना, ऊपरी पेट में असहजता महसूस होना और डाइजेशन संबंधी दिक्कतें इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं. समस्या यह है कि महिलाएं इन लक्षणों को गैस, हार्मोनल बदलाव या अन्य सामान्य परेशानियों से जोड़कर टाल देती हैं.
किन दिक्कतों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?
डॉ. शोना नाग के मुताबिक लगातार पेट फूलना सबसे आम संकेतों में से एक है. कई मरीज बताते हैं कि कम खाना खाने के बाद भी उन्हें अत्यधिक भरा हुआ महसूस होता है. यदि इसके साथ पेट के निचले हिस्से या पेल्विक एरिया में दर्द भी बना रहे या बार-बार लौटकर आए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा पीरियड्स में असामान्य बदलाव, बहुत ज्यादा या बहुत कम ब्लीडिंग, अनियमित पीरियड्स या मेनोपॉज के बाद किसी भी तरह की ब्लीडिंग गंभीर संकेत हो सकते हैं. डॉ. शोना के अनुसार, हार्मोनल बदलाव आम बात है, लेकिन लगातार बनी रहने वाली अनियमितताएं चिकित्सकीय जांच की मांग करती हैं. इसी तरह बदबूदार, खून जैसा या मेनोपॉज के बाद होने वाला असामान्य वेजाइनल डिस्चार्ज भी चेतावनी का संकेत हो सकता है.
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किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
एक्सपर्ट के अनुसार यदि कोई लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक बना रहे या महीने में 12 दिनों से ज्यादा दिखाई दे, तो तुरंत गायनेकोलॉजिक ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए. जिन महिलाओं के परिवार में ओवेरियन, ब्रेस्ट या कोलन कैंसर का हिस्ट्री रहा है, उन्हें विशेष रूप से सतर्क रहने की जरूरत है. ऐसे मामलों में जैनिटक जोखिम अधिक होता है. क्योंकि ओवेरियन कैंसर के लिए सर्वाइकल या ब्रेस्ट कैंसर जैसी कोई नियमित स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं है, इसलिए जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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