Rajeev hatha yoga
हठ योग
आदिनाथ (भगवान शिव) को सर्वोच्च चेतना और योग के प्रथम गुरु माना गया है।
वे ही इस ब्रह्मांड के सृजन, पालन और संहार के मूल कारण हैं।
उनसे ही योग-विद्या का प्रादुर्भाव हुआ, जो सभी प्राणियों के कल्याण के लिए है।
यह कहा गया है कि एक ही परम चेतना अलग-अलग रूपों में जानी जाती है—
ब्रह्म के रूप में (निराकार परम सत्य),
पुरुष के रूप में,
विष्णु के रूप में,
और शिव के रूप में।
यह सारी सृष्टि उसी एक चेतना से उत्पन्न हुई है और अंत में उसी में विलीन हो जाती है।
प्रणव (ॐ) और ध्यान
ॐ को सभी ध्वनियों का मूल कहा गया है।
यह चेतना का सूक्ष्म प्रतीक है।
इसके ध्यान से मन शुद्ध होता है और साधक भीतर की शांति को अनुभव करता है।
हठयोग का उद्देश्य
हठयोग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ करना नहीं है, बल्कि—
मन को स्थिर करना,
इंद्रियों पर नियंत्रण,
और अंत में राजयोग (समाधि) की ओर ले जाना है।
आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध आदि साधन शरीर और मन को शुद्ध करके कुंडलिनी शक्ति के जागरण में सहायता करते हैं।
गुरु और शिष्य
ग्रंथ में कहा गया है कि— योग का ज्ञान गुरु से ही ठीक प्रकार से प्राप्त होता है।
गुरु की कृपा के बिना गूढ़ योग-तत्त्व समझना कठिन है।
हठयोग प्रदीपिका – अध्याय 1, श्लोक 1
श्लोक (संस्कृत):
श्रीआदिनाथाय नमोऽस्तु तस्मै
येनोपदिष्टा हठयोगविद्या।
विभ्राजते प्रोन्तराजयोगं
आरोढुमिच्छोरधिरोहिणी॥
श्लोक का सीधा अर्थ
मैं आदिनाथ (भगवान शिव) को नमन करता हूँ,
जिन्होंने हठयोग का ज्ञान दिया।
यह हठयोग सीढ़ी की तरह है,
जिससे साधक राजयोग (उच्चतम योग अवस्था) तक पहुँचता है।
अब इसे “श्रद्धा” से जोड़कर समझिए
गुरु को प्रणाम = श्रद्धा
श्लोक की शुरुआत ही नमन (नमोऽस्तु) से होती है।
यही बताता है कि—
योग की शुरुआत शरीर से नहीं, श्रद्धा से होती है।
गुरु को प्रणाम करने का अर्थ:
“मैं सब कुछ नहीं जानता”
“मुझे मार्गदर्शन चाहिए”
यही अहंकार का त्याग है।
संकल्प का भाव
श्लोक में कहा गया है —
राजयोग तक पहुँचने के लिए हठयोग सीढ़ी है
इसका मतलब:
साधक ने पहले ही मन में तय कर लिया (संकल्प लिया)
मेरा लक्ष्य केवल आसन नहीं, बल्कि उच्च चेतना है
यही संकल्प है, जो साधक को रास्ते से भटकने नहीं देता।
श्रद्धा क्यों ज़रूरी है? (हठयोग का रहस्य)
हठयोग प्रदीपिका साफ़ कहती है:
हठयोग अंत नहीं है
हठयोग तैयारी है
अगर श्रद्धा नहीं होगी तो:
योग सिर्फ कसरत बन जाएगा
अहंकार बढ़ेगा
चेतना नहीं उठेगी
इसलिए पहले गुरु प्रणाम, फिर अभ्यास।
हठयोग प्रदीपिका का छुपा हुआ संदेश
बाहरी अर्थ
अंदरूनी अर्थ
आदिनाथ को प्रणाम
अहंकार का विसर्जन
हठयोग
शरीर-मन की शुद्धि
राजयोग
उच्च चेतना / समाधि
सीढ़ी
क्रमबद्ध साधना
यह सब तभी संभव है जब श्रद्धा हो।
श्रद्धा की परिभाषा (हठयोग के अनुसार)
जब साधक यह जान ले कि
ज्ञान मेरा नहीं,
गुरु-परंपरा और शिव-तत्व की कृपा है —
वही श्रद्धा है।
एक पंक्ति में पूरा सार
हठयोग प्रदीपिका कहती है:
श्रद्धा के बिना हठयोग व्यायाम है,
श्रद्धा के साथ हठयोग राजयोग का द्वार है।
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21/12/2023
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