Gaya Against Corruption & Injustice

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मानवाधिकार हनन , भ्रष्टाचार , अन्याय के खिलाफ संघर्षरत ....

01/06/2026

आदरणीय डॉ. संतोष कुमार सुमन जी,
आपकी पोस्ट पढ़ी। लोकतंत्र, राजनीतिक शालीनता और जनता की शक्ति पर आपके विचार स्वागत योग्य हैं। किंतु लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह केवल दूसरों पर प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं देता, बल्कि स्वयं के आचरण, कार्यशैली और जवाबदेही का भी आत्ममंथन करने की अपेक्षा करता है।

आज आपके नेतृत्व वाले विभाग में दर्जनों आरटीआई आवेदन लंबित पड़े हैं। सूचना के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून के प्रति विभागीय उदासीनता स्वयं विभाग की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। यदि जनता को सूचना प्राप्त करने के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़े, तो पारदर्शिता की बातें केवल भाषणों तक सीमित होकर रह जाती हैं।

इसी प्रकार आम कार्यकर्ताओं और जनता के बीच यह धारणा भी लगातार मजबूत हो रही है कि विभागीय कार्यों एवं ठेकों में अवसर उन्हीं लोगों को अधिक प्राप्त हो रहे हैं जिन्हें सत्ता और प्रभाव का निकट सानिध्य हासिल है।

यह धारणा सही है या गलत, इसका निर्णय तथ्य और समय करेंगे, लेकिन ऐसी चर्चाओं का व्यापक होना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

मंत्री पद पर होना एक बड़ी जिम्मेदारी है। यह भी एक राजनीतिक सत्य है कि आपको जो अवसर प्राप्त हुए हैं, उनके साथ जनता और संगठन के प्रति आपकी जवाबदेही भी उतनी ही बढ़ जाती है। इसलिए पद के साथ विनम्रता, संवाद और आत्ममंथन भी आवश्यक है। अहंकार किसी भी जनप्रतिनिधि का सबसे बड़ा शत्रु होता है।

एक और कड़वा सच यह है कि आपकी पार्टी के अनेक पुराने, समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ता आज स्वयं को संगठन से कटा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिन लोगों ने गांव-गांव पार्टी का झंडा उठाया, अपने संसाधनों से बैठकें कीं, रैलियां आयोजित कीं और कठिन समय में संगठन को खड़ा किया, वे आज उपेक्षा का अनुभव कर रहे हैं। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए शुभ संकेत नहीं है।

मेरी व्यक्तिगत राय में आज भी पार्टी के साथ जो कार्यकर्ता और समर्थक जुड़े हुए हैं, उनमें से बड़ी संख्या आदरणीय जीतन राम मांझी जी के संघर्ष, व्यक्तित्व और विश्वसनीयता के कारण जुड़ी हुई है। मांझी जी ने इस पार्टी को गरीबों, वंचितों और संघर्षशील लोगों की आवाज के रूप में स्थापित किया। उस विरासत को मजबूत करना हम सबकी जिम्मेदारी है।

संगठन केवल भाषणों से नहीं चलता। यदि कार्यकर्ताओं को सम्मान, भागीदारी और अवसर नहीं मिलेगा, तो उनके मन में निराशा उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

कोई भी कार्यकर्ता अनिश्चितकाल तक अपना समय, श्रम और संसाधन लगाकर संगठन को जीवित नहीं रख सकता। पार्टी का खर्च, बैठकों का खर्च और राजनीतिक गतिविधियों का बोझ केवल कार्यकर्ताओं के कंधों पर नहीं छोड़ा जा सकता।

इतिहास इस बात का भी गवाह है कि किसी भी संगठन या राजनीतिक दल को सबसे अधिक नुकसान उसके विरोधियों से नहीं, बल्कि अंध-प्रशंसा करने वालों से होता है।

चाटुकारिता नेतृत्व को वास्तविकता से दूर कर देती है। बड़े-बड़े राजनीतिक संगठन इसलिए कमजोर हुए क्योंकि उनके आसपास ऐसे लोग इकट्ठा हो गए जो सच बताने के बजाय केवल वही कहते थे जो नेतृत्व सुनना चाहता था।
आज आपके आसपास भी ऐसे लोगों की कमी नहीं दिखती जो हर निर्णय को सही और हर आलोचना को गलत साबित करने में लगे रहते हैं।

किंतु सच्चा साथी वह नहीं होता जो हर समय ताली बजाए, बल्कि वह होता है जो आवश्यकता पड़ने पर आईना दिखाने का साहस रखता है। यदि नेतृत्व केवल प्रशंसा सुनता रहे और आलोचना से दूरी बना ले, तो संगठन धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कटने लगता है।

कुटुम्बा की जनता का जनादेश भी लोकतंत्र का ही हिस्सा है। जनता कब किसे स्वीकार करे और किसे अस्वीकार करे, इसका निर्णय अंततः जनता ही करती है। इसलिए जनप्रतिनिधियों के लिए सबसे बड़ी पूंजी पद नहीं, बल्कि जनता और कार्यकर्ताओं का विश्वास होता है।

इसीलिए मेरा विनम्र सुझाव है कि दूसरों को राजनीतिक संस्कृति और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने के साथ-साथ अपने विभाग की पारदर्शिता, लंबित आरटीआई मामलों, कार्यकर्ताओं की भागीदारी, संगठन की वर्तमान स्थिति और जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता पर भी गंभीरता से आत्ममंथन करें।

अंत में, अभिषेक चटर्जी प्रकरण पर आपका सार्वजनिक बयान न तो पर्याप्त संतुलित प्रतीत हुआ और न ही उस स्तर का, जिसकी अपेक्षा एक जिम्मेदार मंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष से की जाती है।

लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व केवल विरोधियों के लिए नहीं, बल्कि अपने समर्थकों और अपने वक्तव्यों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।

लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति न सत्ता होती है, न पद; सबसे बड़ी शक्ति जनता और कार्यकर्ताओं का विश्वास होता है।

— राज गौतम (अधिवक्ता)

16/05/2026

देश की राजनीति का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दौर तब होता है जब सत्ता पक्ष के सहयोगी प्रवक्ता और टीवी डिबेट के तथाकथित “चेहरे” जनता के असली मुद्दों पर चुप रहते हैं, लेकिन तुच्छ और भटकाने वाले विषयों पर घंटों शोर मचाते हैं।
समोसे, 28 दिन के रिचार्ज, कपड़ों, खान-पान, फिल्मों और सोशल मीडिया ट्रेंड पर तुरंत बयान देने वाले यही लोग तब मौन साध लेते हैं जब:
NEET जैसी देश की सबसे बड़ी परीक्षा पर सवाल उठते हैं,
पेपर लीक से करोड़ों छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है,
बेरोजगार युवा सड़कों पर संघर्ष कर रहे होते हैं,
किसान आत्महत्या कर रहे होते हैं,
महंगाई से गरीब परिवार टूट रहे होते हैं,
या किसी राज्य में कानून व्यवस्था चरमरा रही होती है।
जब बिहार में भर्ती परीक्षाओं पर विवाद हुए, लाखों अभ्यर्थी परेशान हुए — तब ये लोग कहाँ थे?
जब युवाओं ने रोजगार के लिए प्रदर्शन किया — तब कितने प्रवक्ताओं ने खुलकर सरकार से जवाब माँगा?
जब मणिपुर महीनों तक जलता रहा, महिलाएँ सड़कों पर अपमानित हुईं और पूरा देश स्तब्ध था — तब कई तथाकथित राष्ट्रवादी प्रवक्ताओं की आवाज क्यों दब गई थी?
जब पेपर लीक ने गरीब छात्रों के वर्षों की मेहनत बर्बाद कर दी, तब टीवी पर चीखने वाले यही लोग अचानक शांत क्यों हो गए?
सच्चाई यह है कि ऐसे कई प्रवक्ता जनता की आवाज नहीं, बल्कि केवल अपने राजनीतिक मालिकों की छवि बचाने का माध्यम बन चुके हैं।
इनका काम जनता के मुद्दों को उठाना नहीं, बल्कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाना बन गया है।
जनता को अब समझना होगा कि: हर टीवी डिबेट करने वाला व्यक्ति जनहितैषी नहीं होता।
कुछ लोग केवल अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर बोलते हैं।
जनता के दर्द से उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं होता।
आज जरूरत इस बात की है कि:
जनता ऐसे लोगों की बातों को आँख बंद करके मानना बंद करे,
उनकी अपीलों और भावनात्मक नारों से प्रभावित होने के बजाय उनके वास्तविक कार्यों को देखे,
और यह याद रखे कि देश का भविष्य टीवी की चीखती बहसों से नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, न्याय और पारदर्शिता से बनेगा।
लोकतंत्र में जनता मालिक होती है।
इसलिए जनता को भी अब यह तय करना होगा कि वह मुद्दों की राजनीति सुनेगी या केवल शोर, प्रचार और ध्यान भटकाने वाली बयानबाजी।

29/03/2026
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