Health and wellness -Ayurveda

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24/04/2021

Are you ready to earn money where you have to advice peoples for making good health and give advice for lifestyle disease.

09/04/2021

जानिए अल्जाइमर के कारण, लक्षण, इलाज व बचाव।

अल्जाइमर एक तरह की बीमारी है। जो मस्तिष्क की तंत्रिका को प्रभावित करता है। यह रोग वृद्ध आयु वाले लोगो में देखा जाता है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति की याददाश्त बहुत कमजोर हो जाती है एव उनका दिमाग ठीक तरह से कार्य नहीं कर पाता है। जिससे उनकी दैनिक दिनचर्या धीरे-धीरे खराब होने लगती है। अल्जाइमर को एक प्रकार का डिमेंशिया भी कहते है। अल्जामइर को पूर्ण रूप से ठीक नहीं कर सकते है। लेकिन इनके लक्षणो पर नियंत्रण रख सकते है। चलिए अल्जाइमर के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त करते है।

अल्जामइर क्या है ?
अल्जाइमर के क्या कारण है ?
अल्जाइमर के क्या लक्षण है ?
अल्जाइमर का इलाज क्या है ?
अल्जाइमर से बचाव कैसे करें ?
अल्जामइर क्या है ?
अल्जामइर एक तंत्र सम्बंधित एक विकार है। जो व्यक्ति के मस्तिष्क को कमजोर बना देती है। जिसके कारण व्यक्ति को कुछ भी याद नहीं रहता है। व्यक्ति की याद रखने की शक्ति समाप्त होने लगती है। ऐसा सिर्फ वृद्ध अवस्था में होने वाले लोगो में होता है। शरीर कमजोर होने पर दिमाग भी कमजोर होने लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योकि उनकी दिमाग की कोशिकाएं और मस्तिष्क का ठीक से संपर्क नहीं हो पाता है। अल्जाइमर के रोग से पीड़ित व्यक्ति को वस्तुए और चेहरों को पहचानने में बहुत कठिनाई होती है।

अल्जाइमर के क्या कारण है ?
85 आयु से अधिक होने वाले लोगो में अल्जाइमर का खतरा अधिक रहता है।
पहले की सिर में चोट होने के कारण अल्जाइमर हो सकता है।
नींद में अनिंद्रा जैसी बीमारी होने के कारण अल्जाइमर की शिकायत हो सकती है।
अनुवांशिक यानि पारिवारिक इतिहास होने के कारण अल्जाइमर रोग आपको भी हो सकता है।
अल्जाइमर के क्या लक्षण है ?
अल्जाइमर के लक्षणो को तीन वर्गों में विभाजित किया है।
1 शुरुवाती लक्षण :-

समय का ध्यान नहीं होना।
चीजों को खो देना।
खराब अनुमान के कारण गलत फैसला लेना।
रोजाना के कार्यो को समय पर पूरा न कर पाना।
सामाजिक कार्यो से अलग रहना।
बातचीत करने में समस्या उत्पन्न होना।
रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने वाली यादाश्त की समस्याएं होना।
2 मध्यम लक्षण :-

बिना कारण के क्रोध आना।
दोस्तों और परिवार के सदस्यों को पहचाने में समस्या होना।
पढ़ने-लिखने के कार्यो में कठिनाई आना।
नये कार्यो को सिखने और समझने में असमर्थ हो जाते है।
व्यवहार के लक्षणो में गड़बड़ी होना जैसे की रोना, चिंता, भटकना, बेचैनी इत्यादि होता है।
3 गंभीर लक्षण :-

वजन कम होना।
दौरे पड़ना।
त्वचा में संक्रमण होना।
आहे भरना।
निगलने में परेशानी होना।
पेशाब में कमी होना।
अल्जाइमर का इलाज क्या है ? (What are The Treatments for A
अल्जाइमर का कोई इलाज नहीं है। लेकिन इनके लक्षणो को कम करने के लिए डॉक्टर कुछ दवाओं की खुराक देते है। ताकि व्यक्ति कुछ हद तक राहत मिल सके।
अल्जाइमर से बचाव कैसे करें ?
अल्जाइमर का कोई इलाज नहीं है। लेकिन कुछ वैज्ञानिको के शोध के अनुसार अल्जाइमर के जोखिम को कम करने से अल्जाइमर रोग को कम कर सकते है। जोखिम को बढ़ाने वाले कारक को पहले नियंत्रित रखना चाहिए।

डायबिटीज यानि मधुमेह की बीमारी।
हाई ब्लड प्रेशर।
हाई कोलेस्ट्रॉल।
अधिक मोटापा। (मोटापा कम करने के लिए और पढ़े – मोटापा क्या होता है और मोटापा कम करने
के लिए उपचार क्या है

13/03/2021

Tuberculosis के होते हैं ये लक्षण, ऐसे करें बचाव

टीबी खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह शरीर के जिस हिस्से में होती है, सही इलाज न हो तो उसे बेकार कर देती है। इसलिए टीबी के आसार नजर आने पर जांच करानी चाहिए। मरीज किसी एक प्लास्टिक बैग में थूके और उसमें फिनाइल डालकर अच्छी तरह बंद कर डस्टबिन में डाल दें। यहां-वहां नहीं थूकें।

टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो ट्यूबरक्‍युलोसिस बैक्टीरिया के कारण होती है। इस बीमारी का सबसे अधिक प्रभाव फेफडों पर होता है। फेफड़ों के अलावा ब्रेन, यूटरस, मुंह, लिवर, किडनी, गले आदि में भी टीबी हो सकती है। बताते चलें कि सबसे कॉमन फेफड़ों का टीबी है, जो कि हवा के जरिए एक से दूसरे इंसान में फैलती है। टीबी के मरीज के खांसने और छींकने के दौरान मुंह-नाक से निकलने वालीं बारीक बूंदें इन्हें फैलाती हैं। फेफड़ों के अलावा दूसरी कोई टीबी एक से दूसरे में नहीं फैलती। टीबी खतरनाक इसलिए है क्योंकि यह शरीर के जिस हिस्से में होती है, सही इलाज न हो तो उसे बेकार कर देती है। इसलिए टीबी के आसार नजर आने पर जांच करानी चाहिए।

पहले जानें लक्षण:

खांसी आना
टीबी सबसे ज्यादा फेफड़ो को प्रभावित करती है, इसलिए शुरुआती लक्षण खांसी आना है। पहले तो सूखी खांसी आती है लेकिन बाद में खांसी के साथ बलगम और खून भी आने लगता है। दो हफ्तों या उससे ज्यादा खांसी आए तो टीबी की जांच करा लेनी चाहिए।

पसीना आना
पसीना आना टीबी होने का लक्षण है। मरीज को रात में सोते समय पसीना आता है। वहीं, मौसम चाहे जैसा भी हो रात को पसीना आता है। टीबी के मरीज को अधिक ठंड होने के बावजूद भी पसीना आता है।

बुखार रहना
जिन लोगों को टीबी होती है, उन्हें लगातार बुखार रहता है। शुरुआत में लो-ग्रेड में बुखार रहता है लेकिन बाद संक्रमण ज्यादा फैलने पर बुखार तेज होता चला जाता है।

थकावट होना
टीबी के मरीज की बीमारी से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। जिसके कारण उसकी ताकत कम होने लगती है। वहीं, मरीज के कम काम करने पर अधिक थकावट होने लगती है।

वजन घटना
टीबी हो जाने के बाद लगातार वजन घटने लगता है। खानपान पर ध्यान देने के बाद भी वजन कम होता रहता है। वहीं, टीबी के मरीज की खाने को लेकर रुचि कम होने लगती है।

सांस लेने में परेशानी
टीबी हो जाने पर खांसी आती है, जिसके कारण सांस लेने में परेशानी होती है। अधिक खांसी आने से सांस भी फूलने लगती है।

बचाव के तरीके
1- 2 हफ्ते से ज्यादा खांसी होने पर डॉक्टर को दिखाएं। दवा का पूरा कोर्स लें। डॉक्टर से बिना पूछे दवा बंद न करे।

2- मास्क पहनें या हर बार खांसने या छींकने से पहले मुंह को पेपर नैपकिन से कवर करें।
3- मरीज किसी एक प्लास्टिक बैग में थूके और उसमें फिनाइल डालकर अच्छी तरह बंद कर डस्टबिन में डाल दें। यहां-वहां नहीं थूकें।
4- मरीज हवादार और अच्छी रोशनी वाले कमरे में रहे। साथ ही एसी से परहेज करे।
5- पौष्टिक खाना खाए, एक्सरसाइज व योग करे।

6- बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, तंबाकू, शराब आदि से परहेज करें।
7- भीड़-भाड़ वाली और गंदी जगहों पर जाने से बचें।
8- बच्चे के जन्म पर BCG का टीका लगवाएं।

11/03/2021

आजकल के लाइफस्टाइल और खाने पीने की गलत आदतों की वजह से किडनी में स्टोन होना एक आम समस्या बनती जा रही है। यदि व्यक्ति की पथरी बड़ी हो तो वो शरीर से यूरीन निकलने में रुकावट पैदा करने लगती है। जिसकी वजह से व्यक्ति को असहनीय दर्द होने लगता है। ऐसे में इस परेशानी से बचने के लिए व्यक्ति को कुछ आसान संकेतो और खाने-पीने से जुड़ी कुछ जरूरी बातों को जानना बेहद जरूरी है। आइए आज आपको बताते हैं पथरी से राहत पाने के लिए किस चीज का करें सेवन और किससे रहें दूर।

किडनी स्टोन होने पर किस चीज का करें सेवन-
1. तुलसी
तुलसी की पत्तियों में मौजूद तत्व शरीर के यूरिक एसिड के स्तर को स्थिर करने में मदद करते हैं। इसकी वजह से व्यक्ति के शरीर में किडनी स्टोन नहीं बन पाते हैं। खास बात यह है कि तुलसी में मौजूद ऐसिटिक एसिड किडनी स्टोन को शरीर के भीतर ही घुलकर खत्म करने में मदद करता है। किडनी स्टोन से राहत पाने के लिए व्यक्ति को रोजाना एक चम्मच तुसली का जूस पीना चाहिए।

2. नींबू का जूस-
नींबू में मौजूद सिट्रेट नाम का तत्व कैल्शियम डिपॉज़िट को तोड़कर उसकी ग्रोथ की प्रक्रिया को धीमा करता है। किडनी स्टोन से राहत पाने के लिए व्यक्ति को रोजाना भोजन के बाद नींबू के रस का सेवन करना चाहिए।

​3. वीटग्रास का जूस-
वीटग्रास यानी गेंहू की घास में मौजूद तत्व यूरिन के बनने में मदद करते हैं।जिसकी वजह से किडनी में मौजूद स्टोन आसानी से यूरिन के रास्ते शरीर से बाहर निकल जाता है।

4. पानी-
किडनी को पथरी से बचाने का यह सबसे आसान तरीका है ज्यादा से ज्यादा पानी का सेवन। किडनी में स्टोन बनने का प्रमुख कारण शरीर में पानी की कमी का होना। इससे राहत पाने के लिए खूब पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से शरीर में पानी की कमी नहीं होगी और किडनी सुरक्षित रहेगी।

किडनी स्टोन से पीड़ित व्यक्ति को इन चीजों से करना चाहिए परहेज-
1- पालक-
पथरी के मरीजों को पालक, चॉकलेट का सेवन नहीं करना चाहिए। इसमें मौजूद ऑक्सलेट शरीर में कैल्शियम को जमा करके यूरिन में नहीं जाने देता।

2-टमाटर-
टमाटर में भी ऑक्सलेट काफी मात्रा में पाया जाता है। यदि कोई पथरी का मरीज टमाटर का सेवन करना चाहता हो तो उसे टमाटर का सेवन करने से पहले उसके बीज निकाल देने चाहिए।

3-अधिक सोडियम लेने से भी बचें-
पथरी के मरीजों को अधिक नमक खाने से भी बचना चाहिए। नमक में मौजूद सोडियम पेट में जाते ही कैल्शियम बन जाता है और पथरी को बढ़ा देता है।

4-सी-फूड से बनाएं दूरी-
सी-फूड और प्रोटीन वाली चीजों के सेवन से स्टोन से पीड़ित व्यक्ति को परहेज करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें प्यूरिन नाम का एक तत्व मौजूद होता है। जो शरीर में पहुंचते ही यूरिक एसिड का स्तर बढ़ा देता है। जिसकी वजह से पथरी का साइज बढ़ने लगता है।

10/03/2021

ये लक्षण दिखें तो समझ लीजिए लिवर हो रहा है खराब, इन आदतों को फौरन छोड़ दें

जीवनशैली और खानपान की अनियमितता की वजह से लिवर की समस्या आम हो गई है। लिवर की समस्या से पाचन क्रिया प्रभावित होती है। गैस से लेकर अपच तक कई समस्याएं होने लगती हैं। कई बार लिवर की समस्याएं घातक बीमारी का रूप भी धारण कर लेती हैं। अगर आपको भी लिवर की समस्या हो रही है तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें। फौरन डॉक्टर को दिखाएं और अपने खान-पान में सावधानी बरतें

लिवर की समस्या को पहचानना बेहद जरूरी है। अगर आपको पेट से संबंधित बीमारियां या दिक्कतें ज्यादा होती है तो समझिए लिवर में जरूर कुछ गड़बड़ है। अगर आपको अक्सर पाचन संबंधी दिक्कतें होती हैं तो इसे अनदेखा न करें। समझ लें कि आपका लिवर गड़बड़ हो रहा है और आपको संकेत मिल रहे हैं। दरअसल, जब लिवर में समस्या आती है तो हमारे शरीर में कई बदलाव होने लगते हैं। जल्दी थकान महसूस होने से लेकर मल में दिक्कत तक कई समस्याएं सामने आती हैं।

अगर आपको ज्यादा पीले गहरे रंग की पेशाब हो रही है तो समझिए आपको लिवर की समस्या हो रही है। अगर आपके पेट में दर्द, सूझन और लगातार आपको पाचन की समस्या हो रही है तो आपके लिवर में दिक्कत हो सकती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टरी सलाह जरूर लें। इसके अलावा पैरों में सूजन, आंखों का रंग पीला होना और मल का कभी ज्यादा ठोस होना और कभी पतला होना भी लिवर की समस्या बताता है।
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लिवर की समस्या से बचने का सबसे अच्छा उपाय खान-पान में नियंत्रण रखना है। हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि आप क्या खा रहे हैं और कितनी मात्रा में खा रहे हैं। इसके अलावा बाहर का खाना कम कर दें। जंक फूड कम मात्रा में लें। घर का बना खाना ही खाएं। खाने के साथ ही भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ लें।

शराब और धूम्रपान लिवर को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। ऐसे में इन चीजों से बचें। इसके अलावा हल्का खाना खाएं और ज्यादा मात्रा में मांसाहारी खाना न खाएं। लिवर की समस्या से बचने का सबसे अच्छा उपाय है खिचड़ी, दाल और अपने भोजन में बेहद हल्का खाना शामिल करें। तेल और मसालेदार खाने का सेवन एकदम छोड़ दें। इससे लिवर से जुड़े रोग बढ़ते हैं और पेट की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। अपने खाने में सलाद और हरी सब्जियों को शामिल करें। ये लिवर के लिए बेहद अच्छी होती हैं। अगर आपको बार-बार पाचन की समस्या होती है तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं।

Photos from Health and wellness -Ayurveda's post 17/02/2021

एलर्जी बेहद कॉमन बीमारी है। किसी को खाने की चीज से, किसी को किसी खास महक से तो किसी को डॉग या कैट से एलर्जी हो सकती है। एलर्जी की कुछ और भी वजहें हैं। एक्सपर्ट्स से बात करके एलर्जी से बचने और इससे निपटने के तरीके बता रही हैं

एलर्जी: कारण और दूर करने के कारगर उपाय
एलर्जी: कारण और दूर करने के कारगर उपाय

मुक्ति जब भी दूध या दूध से बना कुछ खा लेती हैं, उनके शरीर में खुजली होने लग जाती है। रोशन जब कभी तरबूज खाते हैं तो पूरे शरीर में लाल चकत्ते निकल आते हैं या उलटियां होने लग जाती हैं। अमित को यूं तो कोई हेल्थ इश्यू नहीं है, लेकिन जब भी घर में साफ-सफाई होती है और धूल नाक में चली जाती है, तो उनकी सांसें तेज-तेज चलने लगती हैं और नाक और आंखों से पानी आने लगता है। नियति को हल्के धुएं में भी सांस लेने में दिक्कत होती है और खांसी होने लगती है। ये एलर्जी के लक्षण हैं यानी ये लोग किसी तरह की एलर्जी से पीड़ित हैं।

क्या होती है एलर्जी

जब हमारा शरीर किसी चीज को लेकर ओवर-रिऐक्ट करता है तो उसे एलर्जी कहते हैं। एलर्जी किसी खाने की चीज, पालतू जानवर, मौसम में बदलाव, कोई फूल-फल-सब्जी के सेवन, खुशबू, धूल, धुआं, दवा यानी किसी भी चीज से हो सकती है। इस स्थिति में हमारा इम्यून सिस्टम कुछ खास चीजों को स्वीकार नहीं कर पाता और नतीजा ऐसे रिऐक्शन के रूप में दिखता है। इस स्थिति में शरीर पर लाल-लाल चकत्ते निकलना, नाक और आंखों से पानी बहना, जी मितलाना, उलटी होना या फिर सांस तेज-तेज चलने से लेकर बुखार तक हो सकता है। ज्यादातर एलर्जी खतरनाक नहीं होतीं, लेकिन कभी-कभार समस्या गंभीर भी हो सकती है।

एलर्जी के कारण

खाने की चीजों से: कुछ लोगों को खाने की चीजों जैसे कि मूंगफली, दूध, अंडा आदि खाने से एलर्जी हो सकती है। जिस चीज से एलर्जी है, उसे खाने के बाद जी मिचलाना, शरीर में खुजली होना या पूरे शरीर पर दाने और चकत्ते निकलने जैसी समस्या हो सकती है। आमतौर पर कुछ खाने के बाद 10 मिनट से लेकर आधे घंटे के अंदर एलर्जी के लक्षण उभरने लगते हैं।

धूल: धूल के कणों में माइक्रोब्स होते हैं जो हमारे आसपास मौजूद रहते हैं। माइक्रोब्स ज्यादा ह्यूमिडिटी में पनपते हैं। इनसे होनेवाली एलर्जी में आमतौर पर छींकें, आंख और नाक से पानी बहना जैसी दिक्कत होती है।

कीट और मच्छर: ऐसे लोगों को किसी कीड़े के काटने पर स्किन एकदम लाल होकर फूल जाती है। कभी-कभार उलटी, चक्कर आना और बुखार भी हो सकता है।

रबड़: रबड़ से बनी किसी भी चीज (गलव्स, कॉन्डम, मेडिकल इक्विमेंट आदि) के इस्तेमाल से जलन, नाक बहना, छींकना, सांस की घबराहट और खुजली की समस्याएं हो सकती हैं।

खुशबू: खुशबू भी कई लोगों के लिए एलर्जी की वजह हो सकती है। परफ्यूम, खुशबू वाली मोमबत्तियां, कई तरह के ब्यूटी प्रॉडक्ट आदि की खुशबू से सिरदर्द, जी मिचलाने आदि की समस्या हो सकती है।

पालतू जानवर: पालतू जानवर भी कई लोगों की एलर्जी का कारण होते हैं। जानवरों के बाल, उनके मुंह से निकलने वाली लार, रूसी आदि से कई लोगों को गंभीर परेशानियां होती हैं।

घास: कई बार घास, पेड़ और फूल भी एलर्जी का कारण होते हैं। इनके संपर्क में आने पर खुजली, आंखों में जलन, लगातार छींक और खुजली आदि की समस्या हो सकती है।

मौसम: कई लोगों को किसी खास मौसम से भी एलर्जी होती है। जब मौसम बदलने लगता है तो इन लोगों को गले की खराश, बुखार, नाक बहना, आंखों में जलन जैसी समस्या होती है। ऐसे में कोशिश करें कि ज्यादा-से-ज्यादा घर के अंदर रहें। तापमान में तेज बदलाव से बचें। यानी एकदम ठंडे से गर्म में या गर्म से ठंडे में न जाएं।

पॉलेन: पॉलेन यानी फूलों के पराग कणों से भी लोगों को एलर्जी होती है। पेड़-पौधों और घास-फूस के संपर्क में आने पर ये बारीक कण नाक और गले में चले जाते हैं और दिक्कत की वजह बनते हैं। जिस मौसम में पॉलेन आते हैं, उस दौरान घर से बाहर कम निकलें। घर की खिड़कियां बंद करके रखें। एसी या पंखे में रहें और कूलर का इस्तेमाल न करें। घर में एयर प्यूरिफायर लगवाएं। घर से बाहर निकलना ही हो तो आंखों पर चश्मा और नाक पर मास्क लगाकर बाहर निकलें।

मेटल: कई लोगों को मेटल जैसे कि गोल्ड या सिल्वर ऑक्सिडाइज्ड जूलरी से एलर्जी होती है तो कुछ को लेदर या सिंथेटिक कपड़ों से। ऐसा होने पर इन चीजों के कॉन्टैक्ट में आने के बाद खुजली आदि हो सकती है। ऐसे लोग इन चीजों के इस्तेमाल से बचें। अगर कभी पहनना ही पड़े और खुजली होने लगे तो उस जगह पर स्टेरॉयड बेस्ड क्रीम लगाएं।

दवा: किसी खास दवा से एलर्जी भी काफी लोगों को होती है। अगर उस दवा को लेना जारी रखा जाए तो परेशानी बढ़ सकती है।

एलर्जी किसको ज्यादा

एक्सपर्ट मानते हैं कि गांवों में रहनेवालों के मुकाबले शहरों में रहने वालों में एलर्जी की समस्या ज्यादा पाई जाती है। जिन बच्चों को ज्यादा साफ-सफाई के साथ पाला जाता है, उनमें भी यह समस्या ज्यादा पाई जाती है क्योंकि उनके शरीर का इम्यून सिस्टम ज्यादा डिवेलप नहीं हो पाता।

बच्चों में एलर्जी होने की आशंका बड़ों से कहीं ज्यादा होती है। बच्चा अगर बहुत ज्यादा थकान का शिकार होता हो, उसे सर्दी-जुकाम बना रहता हो, नाक में खुजली होती हो तो इसे एलर्जी हो सकती है।

सावधानी के लिए जिन चीजों से हम बच्चों को परहेज करा रहे होते हैं, वही परहेज उन्हें और बीमार कर रहा होता है। हम हाइजीन के नाम पर बच्चों को धूल, मिट्टी, बारिश आदि में खेलने से रोकते रहते हैं। इसे हाइजीन हाइपोथीसिस कहते हैं।

जिन बच्चों का वैक्सिनेशन नहीं किया जाता, उनमें भी एलर्जी की समस्या कम देखी गई है। वैक्सिनेशन से बच्चों का शरीर बैक्टीरिया से तो बच जाता है लेकिन इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। जो चीज शरीर के इम्यून सिस्टम को अपने मुताबिक नहीं लगतीं, वह उन्हें अपने तरीके से निकालने की कोशिश में लग जाता है। यह तरीका छींक, चकत्ते, बुखार आदि हो सकता है।

इसी तरह बुजुर्गों में भी एलर्जी की समस्या काफी कॉमन है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है। बदलते मौसम आदि में उनका खास ख्याल रखना चाहिए।

कई बार एलर्जी खानदानी भी होती है। पैरंट्स को अगर धूल या किसी और चीज से एलर्जी हो तो बच्चों को एलर्जी होने के चांस बढ़ जाते हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि दोनों की एलर्जी का स्वरूप एक जैसा ही हो। मां को अगर धूल से एलर्जी की वजह से स्किन रैशेज पड़ते हों तो बच्चे को खुशबू से एलर्जी होने की वजह से छींकें आ सकती हैं।

देश में करीब 20 से 30 फीसदी लोग एलर्जी से पीड़ित हैं, जबकि अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में एलर्जी के मरीजों की संख्या 40 फीसदी से भी ज्यादा है।

कैसे है बचाव संभव

हमारे देश में लोगों को एलर्जी के बारे में जानकारी कम है। अक्सर लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे बार-बार बीमार पड़ रहे हैं तो उसकी वजह खाना या मौसम भी हो सकता है। दरअसल, अगर किसी चीज को लेकर शरीर में रिएक्शन दिखे तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए और दोबारा इस चीज के इस्तेमाल से बचना चाहिए।

बच्चों के इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए उन्हें जरूरी चीजें भी दी जानी चाहिए। बच्चों को चारदीवारी में बंद करके नहीं रखा जाना चाहिए।

बच्चों को धूल-मिट्टी और धूप में खेलने दें। ये बच्चों को बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं। उन्हें बारिश या दूसरे पानी से भी खेलने दें। हां, धूल-मिट्टी में खेलने के बाद उनके हाथ-पैर अच्छे से धुलवाना न भूलें।

अगर किसी को धूल और धुएं से एलर्जी है तो घर से बाहर निकलने से पहले नाक पर रुमाल रखना चाहिए। बचाव ही एलर्जी का इलाज है।

जिन लोगों को ठंड से एलर्जी है, वे ठंडी और खट्टी चीजों जैसे कि अचार, इमली, आइसक्रीम आदि के इस्तेमाल से बचें।

गंदगी से एलर्जी वाले लोगों को समय-समय पर चादर, तकिए के कवर और पर्दे भी बदलते रहना चाहिए। कारपेट यूज न करें या फिर उसे कम-से-कम 6 महीने में ड्राइक्लीन करवाते रहें।

जिस दवा से एलर्जी है, उसे खाने से बचें। डॉक्टर को दिखाएं तो इस एलर्जी के बारे में जरूर बताएं।

घर में केरोसिन वाले स्टोव की जगह एलपीजी या इलेक्ट्रिक स्टोव यूज करें। किचन में एग्जॉस्ट फैन जरूर लगवाएं और खाना पकाते समय उसे चलाएं।

घर को हमेशा बंद न रखें। घर को खुला और हवादार बनाए रखें ताकि साफ हवा आती रहे।

खिड़कियों में महीन जाली लगवाएं और जाली वाली खिड़कियों को हमेशा बंद रखें क्योंकि खुली खिड़की से कीड़े और मच्छर आपके घर में घुस सकते हैं।

दीवारों पर फफूंद और जाले हो गए हों, तो उन्हें साफ करते रहें क्योंकि फफूंद के कारण भी एलर्जी हो सकती है।

बारिश के मौसम में फूल वाले प्लांट्स को घर के अंदर न रखें।

अस्थमा और एलर्जी में फर्क

अस्थमा और एलर्जी में कई चीजें कॉमन हैं, लेकिन फिर भी दोनों अलग-अलग हैं। लगातार कई दिनों तक जुकाम, खांसी या सांस लेने में दिक्कत हो तो इन्फेक्शन इसकी वजह हो सकता है, जबकि अस्थमा में सांस लेने में परेशानी के अलावा रात में सोते वक्त खांसी आना, छाती में जकड़न महसूस होना, एक्सरसाइज करते हुए या सीढ़ियां चढ़ते वक्त सांस फूलना या खांसी आना, ज्यादा ठंड या गर्मी होने पर सांस लेने में दिक्कत होना जैसे लक्षण होते हैं। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अस्थमा भी एक तरह की एलर्जी ही है। जैसे ही शरीर एलर्जी वाली चीजों के संपर्क में आता है, अस्थमा का अटैक होता है। इसे एलर्जिक अस्थमा कहते हैं। हां, अस्थमा और एलर्जी में एक और कनेक्शन है। अगर किसी को एलर्जिक अस्थमा नहीं है, सिर्फ एलर्जी है तो अस्थमा होने का खतरा 40 फीसदी तक बढ़ जाता है।

एलर्जी के लिए टेस्ट

एलर्जी के लिए 2 टेस्ट होते हैं:

1. स्किन पैच टेस्ट: जिस भी चीज से एलर्जी का शक होता है, उसका कंसंट्रेशन स्किन पर पैच के जरिए लगाया जाता है। इसके रिजल्ट सटीक होते हैं।

2. ब्लड टेस्ट: ब्लड टेस्ट से भी एलर्जी की जांच होती है। हालांकि एक्सपर्ट इसे बहुत सटीक नहीं मानते।

स्किन पैच टेस्ट कराने का खर्च 8 से 10 हजार रुपये आता है। टेस्ट के जरिए 60 तरह की एलर्जी की जानकारी मिल जाती है।

एलर्जी का इलाज

ऐलोपथी

फूड एलर्जी खासकर गेहूं से होने वाली सिलियक (Celiac) डिजीज उत्तर भारत में ज्यादा देखी जाती है। अगर किसी युवा में खून की कमी, विटमिन डी या कैल्शियम की कमी पाई जाती है तो हो सकता है कि उसे गेहूं से होने वाली ग्लूटन एलर्जी हो। अगर स्किन टेस्ट पॉजिटिव आता है तो मरीज को गेहूं से बनी चीजें खाने से रोक दिया जाता है। गेहूं के बजाय मक्का, सिंघाड़ा, चने आदि का आटा खाने को दिया जाता है। शरीर में जिन तत्वों की कमी है, उन्हें बढ़ाने के लिए दवाएं भी दी जाती हैं।

वैसे हल्की-फुल्की एलर्जी यानी अगर छींकें आ रही हैं या खुजली हो रही है तो एविल (Avil) और सिट्रिजिन (Cetirizine) ले सकते हैं। ये दोनों जेनरिक नेम हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ये दवाएं कुछ घंटों या फौरी राहत के लिए तो ठीक हैं, लेकिन लंबे समय चलनेवाली एलर्जी में बेअसर हैं। एलर्जी होने पर डॉक्टर को दिखाएं। दवा एलर्जी के प्रकार के अलावा मरीज की स्थिति और उम्र के मुताबिक भी तय की जाती है।

इम्यूनो थेरपी और एलर्जी शॉट्स से भी एलर्जी का इलाज किया जाता है। अगर मरीज की हालत ज्यादा खराब हो, तभी इम्यूनो थेरेपी का सहारा लिया जाता है। यह सेफ तरीका है लेकिन तभी कारगर है, जब किसी ऐसी चीज से ही एलर्जी हो, जिसे नजरअंदाज न किया जा सके। मसलन अगर किसी को प्रॉन खाने से एलर्जी है तो वह उसे नहीं खाएगा, लेकिन अगर पॉलेन से एलर्जी है तो वह हमेशा ही बीमार रहेगा। ऐसे मरीजों को यह थेरपी दी जाती है। इस थेरपी का असर लंबे समय तक रहता है। कई बार इसका असर 3-4 साल तक रहता है। हालांकि हर मरीज पर असर अलग-अलग हो सकता है। यह इलाज थोड़ा महंगा होता है।

होम्योपथी

होम्योपथी में दवा बीमारी के लक्षणों के आधार पर दी जाती है। होम्योपथी में सभी तरह की एलर्जी का इलाज मुमकिन है। हालांकि असर थोड़ा धीमा होता है लेकिन बीमारी पूरी तरह ठीक हो जाती है। खुद इलाज करने के बजाय किसी क्वॉलिफाइड होम्योपैथिक डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

खाने-पीने की चीजों से एलर्जी हो रही है तो नैट्रम मुर (Natrum Mur) की 4 बूंदे सुबह-शाम थोड़े पानी में मिलाकर पीने की सलाह दी जाती है, लेकिन बच्चों के लिए डोज अलग होती है।

एस्प्रिन (Aspirin) दवा से एलर्जी होने पर कार्बो वेज (Carbo Veg) और ऐंटिबायॉटिक से एलर्जी होने पर सल्फर 200 (Sulphur 200) दी जाती है। कुछ एलर्जी में ब्रायोनिया (Bryonia), नक्स वॉम (Nux Vomica), आर्सेनिक एल्बम (Arsenicum Album) आदि दवाएं दी जाती हैं। दवा की डोज उम्र के मुताबिक तय होती है।

आयुर्वेद

रोज सुबह नीबू पानी पिएं।

खट्टी और ठंडी चीजों से परहेज करें।

कभी-कभी कोई दवा खाने से भी एलर्जी हो जाती है इसलिए हमेशा दवा डॉक्टर से पूछकर ही लें।

अगर स्किन एलर्जी है तो फिटकरी के पानी से प्रभावित हिस्से को धोएं। नारियल तेल में कपूर या जैतून तेल मिलाकर लगाएं। चंदन का लेप भी राहत देता है। इससे खुजली कम होती है और चकत्ते भी कम होते हैं।

पंचकर्म का हिस्सा नास्य शिरोधारा भी एलर्जी में भी बहुत मदद करता है। इसमें खास तरीके से तेल नाक में डाला जाता है, लेकिन यह प्रक्रिया घर में नहीं करनी चाहिए। एक्सपर्ट की देखरेख में इसे करें।

नेचुरोपथी और योग

योग और नेचुरोपथी एलर्जी से लड़ने में काफी कारगर हैं। नेचरोपथी एक्सपर्ट्स का कहना है कि एलर्जी से बचने के लिए पेट साफ रखना चाहिए। बहुत गर्म या बहुत ठंडा खाना नहीं खाना चाहिए। हमेशा साफ पानी पीना चाहिए। रोजाना करीब 15 मिनट अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका प्राणायाम करने से एलर्जी में फायदा होता है क्योंकि इनसे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।

अगर जल्दी-जल्दी सर्दी और जुकाम की एलर्जी हो तो सुबह उठकर गुनगुने पानी में नींबू का रस मिलाकर पिएं।

16/02/2021

ऑस्टियोपोरोसिस क्या है?
ऑस्टियोपोरोसिस हड्डी की चयापचय बीमारी है जिससे हड्डी का घनत्व कम होता है। प्रभावित हड्डियों का घनत्व कम हो जाता है और हड्डियां अधिक नाजुक हो जाती हैं, और इसलिए टूटने की अधिक आशंका होती है, जिसके परिणामस्वरूप फ्रैक्चर होता है।

ऑस्टियोपोरोसिस और उम्र के बीच क्या संबंध है?
जीवन प्रक्रिया के दौरान हड्डियां आकार, आकृति और संरचनात्मक घनत्व में बदलती हैं।

सामान्य रूप से, हड्डी का द्रव्यमान बचपन और किशोरावस्था के दौरान सबसे तेज़ी से बनता है, और 30 के दशक के मध्य में अपने चरम पर पहुंच जाता है। उसके बाद, युवा वयस्कता के दौरान अधिकतम हड्डी द्रव्यमान बनाए रखा जाता है।
40 साल की उम्र के आसपास, हड्डी के द्रव्यमान में कमी दिखने लगती है, यह समय एस्ट्रोजेन वापसी के कारण रजोनिवृत्ति के करीब महिलाओं में तेजी से कमी की अवधि होती है।
जब हड्डी के द्रव्यमान में कमी तुलना के हिसाब से तेज़ी से हो, तो ऑस्टियोपोरोसिस और हड्डी फ्रैक्चर बहुत पहले शुरू हो जाएगा।
ऑस्टियोपोरोसिस होने का खतरा किसे है?
जिनके पास इस तरह के जोखिम कारक हैं:

बढ़ती उम्र
महिला होना
एशियाई या कोकेशियान होना
कम वजन या छोटे कद का होना
ऑस्टियोपोरोसिस और हड्डी टूटने का पारिवारिक इतिहास होना
अस्वस्थ जीवनशैली होना, उदाहरण के लिए:
कम केल्सियम सेवन विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो असंतुलित खुराक लेते हैं या कम खाना खाते हैं
धूम्रपान
अत्यधिक शराब पीना
अत्यधिक कैफीन का सेवन
बहुत अधिक सोडियम (नमक) का उपभोग
अपर्याप्त व्यायाम
जो कुछ निश्चित बीमारियों से पीड़ित हैं, उदाहरण के लिए:
समय से पहले रजोनिवृत्ति (उम्र

11/02/2021

हार्ट अटैक (Heart Attack) या कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) आज के दौर में लोगों के लिए सबसे गंभीर समस्या बन गया है. हार्ट अटैक (Heart Attack) अचानक ही होता है और इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. हार्ट अटैक आने का कोई निर्धारित समय या मौसम नहीं नहीं होता है. हालांकि, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सबसे ज्यादा हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट सुबह के समय बाथरूम के अंदर आते हैं.

क्या होता है हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट

गौरतलब है कि हार्ट अटैक (Heart Attack) और कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) का सीधा संबंध हमारे खून से होता है. खून के जरिए हमारे शरीर में ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुंचते हैं. जब हमारे हृदय तक ऑक्सीजन पहुंचाने वाली धमनियों में ब्लॉक जमने की वजह से रुकावट पैदा होने लगती है तो दिल की धड़कन की रफ्तार असंतुलित हो जाती है. ऐसी स्थिति में हार्ट अटैक (Heart Attack) या कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) आ जाता है.

बाथरूम में हार्ट अटैक आने के कारण

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हार्ट अटैक के सबसे ज्यादा केस बाथरूम में ही होते हैं. दरअसल बाथरूम में हार्ट अटैक (Heart Attack Symptom) आने के पीछे बहुत से कारण होते हैं. आपको इन वजहों के बारे में जानकारी जरूर होनी चाहिए ताकि आप खुद को और अपने परिवार को इससे सुरक्षित रख सकें.

प्रेशर से बढ़ती है आशंका

जब हम सुबह के समय टॉयलेट जाते हैं तो पेट को पूरी तरह से साफ करने के लिए प्रेशर लगाते हैं. ध्यान दें, इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करते वक्त लोग अधिक प्रेशर लगाते दिखाई देते हैं. इस प्रेशर से हमारे दिल की धमनियों पर अधिक दबाव पड़ता है. इससे हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट आने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है।

तापमान का भी होता है असर

बाथरूम का तापमान हमारे घर के अन्य कमरों के मुकाबले अधिक ठंडा रहता है. यहां पानी का फ्लो बार-बार होता रहता है. ऐसी स्थिति में शरीर के तापमान को संतुलित करने और ब्लड सर्कुलेशन (Blood Circulation) को बनाए रखने के लिए अधिक मेहनत की जरूरत पड़ती है. दिल का दौरा पड़ने का यह एक बड़ा कारण होता है.

ब्लड प्रेशर से पड़ता है फर्क

सुबह के समय हमारा ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure) थोड़ा हाई होता है. ऐसे में जब हम नहाने के लिए अधिक ठंडा या गर्म पानी सीधा सिर पर डाल देते हैं तो इससे ब्लड प्रेशर और बढ़ जाता है. इस वजह से बाथरूम में हार्ट अटैक (Heart Attack In Washroom) आने का खतरा बढ़ जाता है.

​​हार्ट अटैक से बचाव के तरीके

​​1. हार्ट अटैक (Heart Attack) के जोखिम के बाद अब हमारा यह जान लेना जरूरी है कि इससे कैसे बचा जा सकता है. अगर आप इंडियन टॉयलेट का इस्तेमाल करते हैं तो ज्यादा देर तक एक ही पोजिशन में न बैठें. इससे आप हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट के जोखिम से बच सकते हैं.
2. नहाते समय पानी के तापमान के हिसाब से सबसे पहले पैरों के तलवों को भिगोएं. इसके बाद हल्का पानी सिर पर डालें. इससे आपके शरीर और बाथरूम के तापमान में संतुलन बन जाएगा.
3. टॉयलेट में पेट साफ करने के लिए न तो अधिक जोर लगाएं और न ही जल्दबाजी दिखाएं. टॉयलेट में थोड़ा समय लें.
4. नहाते समय अगर आप बाथ टब का इस्तेमाल करते हैं तो इसका असर भी आपकी धमनियों पर पड़ता है. इसलिए अधिक समय तक बाथ टब में न बैठें.

हार्ट अटैक के लक्षण

​हार्ट अटैक (Heart Attack Symptom) अचानक होने वाली समस्या है. इसलिए ये जरूरी है कि आप इसके लक्षण (Heart Attack Symptoms) को जान लें ताकि किसी में कभी ऐसे लक्षण दिखें तो आप जान सकें कि ये ​हार्ट अटैक है.
1. सीने में तेज दर्द होना
2. सांस लेने में परेशानी आना
3. कमजोरी महसूस करना
4. डायबिटीज (Diabetes) के पेशेंट को कई बार बिना कोई लक्षण दिखे भी हार्ट अटैक आ जाता है. इसे साइलेंट हार्ट अटैक (Silent Heart Attack) कहा जाता है.
5. तनाव और घबराहट होना भी हार्ट अटैक का लक्षण है.
6. चक्कर या उल्टी आना भी हार्ट अटैक का लक्षण हो सकता है.

​हार्ट अटैक आने पर तुरंत क्या करें?

अगर किसी में ​हार्ट अटैक (Heart Attack Ke Upchar) के लक्षण नजर आते हैं तो तुरंत सावधान हो जाएं और ये उपाय करें.
1. किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक आए तो उसे सबसे पहले जमीन पर लिटा दें.
2. अगर व्यक्ति ने अधिक टाइट कपड़े पहने हैं तो उन्हें खोल दें.
3. इस बात का ध्यान रखें कि लेटते समय व्यक्ति का सिर थोड़ा ऊपर की ओर हो.
4. एंबुलेंस के लिए तुरंत फोन करें.
5. हाथ-पैर को रगड़ते रहें.

10/02/2021

बादाम खाने के कई फायदे हैं।

Photos from Health and wellness -Ayurveda's post 09/02/2021

एक अर्बुद (ट्यूमर) का अर्थ है कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि जिससे एक परावर्तित (ट्रांसफॉर्मड) कोशिकाओं का समूह बन जाता है। जिसे गांठ (लम्प) कहा जाता है। इसके बनने के प्रमुख कारण होते हैं- कोशिका विभाजन को नियंत्रित करने वाली प्रक्रिया का समापन तथा उसके अन्दर उपस्थित जीन्स (आनुवंशिकता की इकाई) में किन्हीं लक्षणों के प्रति जीनी उत्परिवर्तन (जीनिक म्यूटेशन)।

सामान्यतः अर्बुद दो प्रकार के होते हैं- सुयम अर्बुद (बिनाइन) जो अधिकतर परिसम्पुटित (इनकेप्स्लेटेड) होते हैं व एक ही स्थान तक सीमित रहते हैं। दूसरे अर्बुद, दुर्दम अर्बुद (मैलिगनेन्ट) कहलाते हैं जिनमें कोशिकायें परिसम्पुटित न होने के कारण रक्त परिवहन के साथ-साथ शरीर के दूसरे भागों में जाकर स्थापित हो जाती हैं (इस प्रक्रिया को स्थलान्तरण या मेटास्टैसिस कहा जाता है)। दुर्दम कोशिकायें (कैन्सरस सेल्स) अपनी सतह पर लगे हुए पदार्थों के कारण विशेष गुणों से युक्त होती हैं साथ ही इनमें एक विशेष घटक (रिसेप्टर) भी होता है जो किसी भी औषधि या हार्मोन के साथ संयुक्त होकर कोशिका की कार्यिकी को बदल देता है। इस कारणवश इन कोशिकाओं में स्वतःस्रावी कारक (ऑटोक्राइन फैक्टर्स) पैदा हो जाते हैं जो उनको विशेष प्रतिजनीय गुण (एण्टीजीनिक प्रॉपर्टी) से युक्त कर देते हैं। हमारे शरीर के प्रतिरोध क्षमता तंत्र (इम्यून सिस्टम) द्वारा इस प्रतिरोधी उद्दीपों के संदर्भ में दुर्दम कोशिकाओं के प्रतिजनों के लिये प्रतिकाय (एण्टी बॉडीज) तो बनाये जाते हैं परन्तु वे इनकी प्रक्रिया को नजरअन्दाज (भेदकर) करते हुए खूब वृद्धि करने में सक्षम होती हैं जो उनकी सतह पर पाये जाने वाले प्रतिजनों में निरन्तर/सतत परिवर्तनों के होते रहने के कारण हुआ करता है। इस प्रकार दुर्दम कोशिकायें शरीर की प्रतिरोध क्षमता वाली कोशिकाओं को भ्रमित करके उन्हें अपना कार्य नहीं करने देती हैं। मनुष्य के शरीर की सभी कोशिकायें अपनी प्रकृति के आधार पर सदैव अपनी-अपनी प्रकार की एक जैसी ही दिखती हैं तथा उनमें अभ्रंशीय (डीजेनेरेटिव) व प्रतिक्रमणीय (रीग्रेसिव) परिवर्तन बहुत कम दिखाई देते हैं। इसके साथ-साथ इन कोशिकाओं में विक्षेपण/स्थलान्तरण (मेटास्टैसिस) की प्रवृत्ति भी नहीं दिखाई देती हैं।

कैंसर शरीर के किसी भाग के ऊतक में उत्पन्न हो सकता है। ऊतकों की प्रकृति के आधार पर इनका वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है-

1. उपकलार्बुद (कार्सिनोमा) - इस प्रकार के दुर्दम अर्बुद उपकलाकी कोशिकाओं में बनते हैं।
2. ग्रन्थिलार्बुद (एडीनो कार्सिनोमा) - ये अधिकतर दुर्दम होते हैं तथा ग्रन्थिल ऊताकों में उपस्थित कोशिकाओं में बनते हैं।
3. लसिकार्बुद (लिम्फोमा) - शरीर में लसीकाम ऊतक से बने हुए कैन्सर जैसे- हॉजकिन्स डिजीज।
4. लसिका सार्कोमा (लिम्फो सार्कोमा) - अधिकांश दुर्दम अर्बुद जो लसिकाम ऊतक में बनते हैं जैसे- लिम्फोसर्कोमा ऑफ इन्टस्टाइन।
5. सार्काबुद (सार्कोमा) - संयोजी ऊतक (कनेक्टिव टिश्यू) जैसे- पेशियों, हड्डियों आदि में बनने वाले अधिकांश दुर्दम अर्बुद जो मूत्राशय, वृक्कों, यकृत, प्लीहा, फेफड़ों आदि को प्रभावित कर सकते हैं।
6. हरितार्बुद/तीव्रश्वेत रक्तता (ल्यूकीमिया) - अस्थिमज्जा व रक्त में उत्पन्न लसिकाभ (लिम्फ्वाइड) या रक्तोत्पादक (हीमैप्वाइटिक) ऊतक में पाया जाने वाला दुर्दम अर्बुद।
7. हिमैन्जियोसार्कोमा - रक्त वाहिनियों का दुर्दम अर्बुद जो अन्तः कला (इन्डोथीलियम) एवं तन्तुप्रस (फाइब्रोब्लास्ट) ऊतक का बना होता है।
8. एमीलोब्लास्टोमा - जबड़े विशेषकर निचले जबड़े का अर्बुद जो दुर्दम भी हो सकता है तथा इसमें इनेमेल की विशिष्ट होती है।
9. यकृतार्बुद (हिपैटोमा) - यकृत में पाया जाने वाला एक दुर्दम अर्बुद।
10. हीमैन्जियोब्लास्टोमा (रक्त वाहिका प्रस अर्बुद) - मस्तिष्क का एक कोशिका- रक्त वाहिका अर्बुद जो अधिकतर अनुमस्तिष्क में होता है।

कैन्सर के प्रारम्भिक लक्षण (प्रोग्नोस्टिक सिम्पटम्स) - चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार शरीर में उत्पन्न कोई परिवर्तन/अपसामान्यता जो छः सप्ताह से ज्यादा अवधि की हो गई हो तथा इस दौरान उसमें गिरावट की स्थिति नहीं दिखाई पड़ती हो तो उसकी तुरंत जाँच करवाना आवश्यक है। कैन्सर की जाँच व उपचार जितना ही जल्दी आरम्भ हो जाये, परिणाम उतने ही अच्छे होने की संभावना है। इस बीमारी के पूर्वानुमान/प्राग्यान से सम्बद्ध सहायक लक्षण निम्नलिखित हो सकते हैं-

1. कोई गांठ या उभार जो शरीर में अचानक ही दिखाई पड़ने लगे।
2. घाव/जख्म विशेषकर ऐसा जिसके किनारे उठे हों तथा बाहर की ओर उल्टे हों जिससे जख्म का रूप गोभी के फल जैसा दिखता हो।
3. बिना किसी विकृति के शरीर से रक्तस्राव या तरल पदार्थ का निकलना।
4. त्वचा में कोई भी परिवर्तन का दिखाई देना।
5. खांसी आना तथा गेले की आवाज का कर्कश होना (हारस्नेस ऑफ वॉयस)
6. मल के स्वरूप व प्रकृति में परिवर्तन जैसे गोल-गोल पिण्डों के रूप में या उसका रंग सामान्य से लाल कालापन लिये होना।
7. बिना कारण या विकृति के अचानक वजन का कम होने लगना (लगभग 7-8 प्रतिशत तक एक माह में)।
8. अकारण या बिना किसी विकृति के सिर में दर्द होना।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की वर्ष 2014 में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार भारत के महानगरों में कैन्सर के 1,00,000 नये रोगी प्रतिवर्ष निदान के दौरान आते देखे गये हैं तथा इसके अनुसार वर्ष 2015 तक यह संख्या बढ़कर 11,48,692 तक पहुँच जायेगी जो 5,48,844 पुरुषों तथा 5,79,847 के नये रोगियों की संख्या तक जा सकती है। भारतीय चिकित्सा व अनुसंधान परिषद की जनसंख्या आधारित कैन्सर पंजीकरण की वर्ष 2013 की रिपोर्ट के अनुसार महानगरों में प्रमुख तीन प्रकार के कैन्सर से संबंधित पुरुषों व स्त्रियों की संख्या इस प्रकार है-



पुरुष

स्त्री

मुँह का कैन्सर-45,669

स्तन का कैन्सर-94288 (जिसमें स्टेज वन 90ः, स्टेज टू 80% तथा स्टेज थ्री 40-50ः की अनुजीवन दर देखी गई है)

फेफड़ों का कैन्सर-52,685

सर्वाइकल कैन्सर-92,731

पौरुष ग्रन्थि (प्रोस्टेट) का कैन्सर-35029

अण्डाशयी कैन्सर-36,423




कैन्सर शोधकर्ताओं का यह भी मत है कि 70% ज्ञात कैन्सर रोगियों के रोग का कारण उनकी जीवनशैली है। अतः इसको सुचारु रूप से ठीक रखकर कम से कम एक बड़ी प्रतिशत की संख्या कैन्सर रोग से बहुत हद तक छुटकारा पा सकती है। भारत में पाये जाने वाले कुछ प्रमुख कैन्सर निम्नलिखित हो सकते हैं-

1. फेफड़ों का कैन्सर - धूम्रपान (किसी भी रूप में) इसका प्रमुख कारक हो सकता है। यह आवश्यक नहीं आप स्वयं धूम्रपान नहीं करते परन्तु फिर भी दूसरों के धूम्रपान से निकले धुएँ को सांस में ले जाने के कारण (पैसिव स्मोकर्स) आपको अधिक खतरा हो सकता है। अतः तम्बाकू के धुएँ से बचाव द्वारा इसके खतरे को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। इस दिशा में मीडिया द्वारा ‘‘तम्बाकू से कैन्सर हो सकता है जो जानलेवा है’’ जैसे विज्ञापनों का निरन्तर दिखाया जाना हो सकता है। जनचेतना को विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सके ऐसा विश्वास किया जा सकता है। इसके प्रमुख लक्षण खांसी, बलगम (रक्त की धारियों में रंजित), आवाज में कर्कशता (हार्शनेस) वजन का गिरना, सीने में दर्द आदि हो सकते हैं। यहाँ यह नितान्त आवश्यक है कि निदानकर्ता को तपेदिक व कैन्सर में विभेद का अच्छा ज्ञान हो क्योंकि ये लक्षण तपेदिक में भी दिखाई देते हैं तथा उसका उपचार यदि जल्दबाजी में शुरू हो गया हो तो दिक्कत आ सकती है। अतः उसके निदान हेतु एक्सरे, सी.टी. स्कैन व जीवोति परीक्षण (बायोप्सी) का प्रयोग होता है।

2. मुँह का कैन्सर - भारत वर्ष में इसके रोगियों की संख्या अधिकतम देखी गई है, इनमें से 70% को तब ज्ञात होता है जब वे स्टेज थ्री व स्टेज फोर तक पहुँच जाते हैं। मुँह का कैन्सर जीवन शैली से सम्बद्ध होता है तथा इसका प्रमुख कारण तम्बाकू का सेवन है। इसके अतिरिक्त नियमित व अत्यधिक मद्यपान भी इसका कारक हो सकता है। कभी-कभी दाँतों की धार अधिक पैनी हो जाती है जिससे मुँह में घाव आदि हो जाने से भी यह रोग हो सकता है। इसके प्रमुख लक्षण मुँह में घाव/जख्म का होना (जो 3 सप्ताह से ऊपर का हो गया हो) मुँह में लाल या श्वेत रंग दाग/धब्बा/पैच दिखना, मुँह खोलने में तकलीफ होना तथा गर्दन में दर्द आदि होते हैं।

3. पौरुष ग्रन्थि (प्रोस्टेट ग्लैंड) कैन्सर - अधिकतर यह 60 वर्ष के ऊपर के पुरुषों में होता है पर कभी-कभी 50 वर्ष व बहुत कम 40-50 वर्ष के पुरुषों में भी देखा गया है। इसके रोगियों में तेजी से पेशाब लगना, पेशाब तुरन्त ही करने की आवश्यकता (ऐसा न करने पर निकल जाने का भय हो सकता या निकल भी सकती है), पेशाब के साथ दर्द का अनुभव, पेशाब की धार का धीमा रहना तथा बूँद-बूँद बहुत समय तक होते रहना (टपकना) जिससे मूत्राशय पूरी तरह खाली नहीं हो पाता (कम्प्लीट वॉयडिंग) आदि प्रमुख लक्षण देखे जाते हैं। निदान हेतु पी.एस.ए. टेस्ट (प्रोस्टेट सिक्रिटिंग एन्टीजेन टेस्ट) के साथ एम.आर.आई. (मैग्नेटिक रेजोनेन्स इमेजिंग) व जीवोति परीक्षण (बायोप्सी) का प्रयोग प्रचलित है।

4. स्तन कैन्सर - टाटा मेमोरियल सेन्टर, मुंबई के आंकड़ों के अनुसार शहरीय भारत में 22 में से 1 महिला को उसके जीवन में स्तन कैन्सर हो सकता है। इसका शिकार सबसे अधिक 43-46 वर्ष की महिलायें होती देखी गई हैं परन्तु, विशेषज्ञों ने 20-30 वर्ष की महिलाओं में भी इसे होते देखा है। इसके लिये आवश्यक है स्वतः स्तन परीक्षण (वी.एस.ई./ब्रेस्ट सेल्फ इग्जामिनेशन) जो महिलाओं को 20 वर्ष की आयु के पश्चात नियमित रूप से करना चाहिये जिससे उनमें होने वाले परिवर्तनों जैसे लाली, गांठ, तरल पदार्थ निकलना आदि को ध्यान से देखना चाहिये। स्वतः परीक्षण के बाद 40 वर्ष की आयु तक नियमित समय पर किसी स्त्री-रोग विशेषज्ञ (गाइनोकोलॉजिस्ट) से परीक्षण करवाना चाहिये। निदान के लिये अल्ट्रासाउन्ड (स्तन व गांठ विशेषकर), एक्स-रे परीक्षण (मैमोग्राफी) के साथ-साथ एम.आर.आई. कराना चाहिये तथा आवश्यक हो तो एफ.एन.ए.सी. विधि द्वारा विकृति विज्ञानी जाँच के साथ मिलाकर सारी चीजों के संदर्भ में देखना चाहिये। यहाँ यह भी आवश्यक बताया जाता है कि जाँच करने की आवश्यकता है कि इस गांठ की कोशिकायें इस्ट्रोजन के प्रति संवेदी तो नहीं हैं (क्योंकि इससे हार्मोन चिकित्सा कारगर हो सकती है)। अतः कुछ नये टेस्ट जैसे इस्ट्रोजन रिसेप्टर ऐसे, प्रोजेस्ट्रॉन रिसेप्टर ऐसे, एच.ई.आर. 2 (ह्यूमन इपीडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर 2, जो कैन्सर की कोशिकाओं की वृद्धि को प्रोत्साहित करता है) भी निदान व पुष्टि हेतु उपयोग में लाये जा रहे हैं।

5. गर्भाशय-ग्रीवा (सर्विक्स) का कैन्सर (सर्वाइकल कैन्सर) - यह कैन्सर धीरे-धीरे बढ़ने वाला होता है जो कई वर्षों (15-20) में विकसित होता गया है। इस कैन्सर का कारक ह्यूमन पैपीलोमा वायरस (एच.पी.वी.) जो संक्रमण द्वारा संसर्ग के दौरान या फिर अन्य कारकों जैसे पति-पत्नी दोनों ही द्वारा अपने जननांगों को ठीक से स्वच्छ न रखना। इसका सबसे अधिक संक्रमण अक्सर 15 वर्ष या कम आयु में प्रथम लैंगिक संसर्ग, एक से अधिक लोगों से संसर्ग (जो गर्भाशय ग्रीवा को क्षति पहुँचाकर उसे संक्रमण हेतु अधिक सुग्राह/गृहणशील/ससेप्टिबिल बना देता है। इसके अतिरिक्त एच.आई.वी. संक्रमण, हर्पीज सिम्पलेक्स, क्लेमाइडिया व गोनोरिया भी इसके कारक हो सकते हैं। इसका निदान लिक्विड बेस्ड पैप टेस्ट (उचित होगा यदि एच.आई.वी. के टेस्ट के साथ किया जाय) द्वारा किया जाता है जिसे जीवोति परीक्षण (बायोप्सी) द्वारा सुनिश्चित भी कर लेना आवश्यक है। प्रारम्भिक अवस्था में इस कैन्सर के रोगी में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, परन्तु बाद की अवस्था में संसर्ग के दौरान पीड़ा होना, रक्तस्राव, अनावश्यक तरल स्राव योनि मार्ग से होना, तथा लम्बे समय से चला आ रहा/जीर्ण (क्रॉनिक) कमर दर्द आदि लक्षण देखे जा सकते हैं।

6. अण्डाशयी कैन्सर (ओवरियन कैन्सर) - महिलाओं में अण्डाशयों की स्थिति बहुत अन्दर होने के कारण उनका भौतिक परीक्षण सरलता से नहीं किया जा सकता अतः इस कैन्सर का पता काफी अग्रिम (एडवान्स्ड) अवस्था में ही चल पाता है। दसियों वर्षों के अनुसंधानों के बाद आज भी यह जानकारी भलीभाँति उपलब्ध नहीं हो सकी है कि अण्डाशयी कैन्सर क्यों होते हैं? इसके प्रमुख लक्षण पेट फूलना, बार-बार पेशाब लगना उदरशूल, रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव, भूख का न लगना, मूत्राशय से रक्त स्राव तथा पेट में गैस भर जाना आदि देखे गये हैं। श्रोणीय भाग का परीक्षण, ट्रान्सवजाइनल सोनोग्राफी तथा सी ए-125 के लिये रक्त परीक्षण द्वारा इसका निदान किया जा सकता है (विशेषकर उन महिलाओं में जिनके परिवार में इसका पूर्व इतिहास रहा हो)।

7. कैन्सर की चिकित्सा/इलाज - आमतौर पर कैन्सर की चिकित्सा हेतु इन तीन प्रकार की विधियों का सहारा लिया जाता है-

1. शल्य चिकित्सा - इस विधि द्वारा कैन्सर से प्रभावित भाग को काटकर शरीर से अलग करके निकाल दिया जाता है। इसका प्रयोग स्तन, बृहदांत्र, मलाशय, फेफड़ों, आमाशय तथा गर्भाशय आदि के कैन्सर हेतु किया जाता है। अर्बुद निकालने के साथ-साथ प्रभावित अंग का संधान/क्षति-पूर्ति भी की जाती है। कभी-कभी अर्बुद के साथ-साथ स्वस्थ ऊतक को भी निकाला जा सकता है जैसे स्तन अपनयनी शल्य (मैस्टेकटॉमी)।

2. विकिरण चिकित्सा - इस विधि में कैन्सर को जलाने के लिये एक्स-रे या अन्य रेडियोधर्मी पदार्थ जैसे कोबाल्ट60 रेडियम आदि की विकिरणों का उपयोग किया जाता है। इस विधि का प्रयोग सामान्यतः मूत्राशय, गर्भाशय-ग्रीवा, त्वचा, ग्रीवा व सिर आदि के कैन्सर की चिकित्सा हेतु किया जाता है परन्तु यह न समझा जाय कि अन्य प्रकार के कैन्सर का इलाज में इसका उपयोग नहीं होता। विकिरण के प्रभाव से प्रभावित ऊतक के साथ-साथ सामान्य ऊतक की कोशिकाएँ भी मर जाती हैं। अतः इसके प्रयोगकर्ताओं को विशेषज्ञ, अनुभवी तथा अत्यधिक सतर्क होना अति आवश्यक है। आधुनिक संयंत्र जैसे सुपरवोल्टेज एक्स-रे, कोबाल्ट बम, लीनियर एक्सीलिरेटर तथा साइक्लोट्रॉन आदि कारगर सिद्ध हुए हैं जिनका उपयोग सिर, ग्रीवा, स्तन, ग्रसनी, फेफड़ों, गर्भाशय ग्रीवा, फेफड़ों तथा पौरुष ग्रन्थि के कैन्सर की चिकित्सा हेतु किया जाता है।

3. औषधियों द्वारा - इसे रासायनिक साधन चिकित्सा (कीमोथिरेपी) भी कहा जाता है। लगभग 50 से ऊपर औषधियों का प्रयोग तीव्रश्वेत रक्तता (ल्यूकीमिया), लसीकार्बुद, वृषण कैन्सर आदि की चिकित्सा हेतु किया जा रहा है। इन औषधियों का निर्माण इस बात को ध्यान में रखकर किया जाता है कि वे कैन्सर कोशिकाओं को तो अधिक परन्तु सामान्य कोशिकाओं को कम से कम प्रभावित करें। ये सारी औषधियाँ अत्यधिक विषैली होती हैं तथा इनके अनेक प्रकार के अनुषंगी प्रभाव (साइड इफेक्ट्स) जैसे उल्टी आना, बालों का गिर जाना, संक्रमण के प्रति अधिक सुग्राह्यता। आजकल कई औषधियों को मिलाकर प्रयोग किया जाता है जिससे अनुषंगी प्रभावों को कम किया जा सके। कैन्सर चिकित्सा में औषधियों के संदर्भ में अत्याधुनिक अनुसंधान निम्नलिखित दिशा में किये जा रहे हैं-

अ. बायो रेसपॉन्स मॉडीफायर थिरेपी - ये वे पदार्थ हैं जो शरीर के प्रतिरोधी क्षमता तंत्र को उत्तेजित करके कैन्सर कोशिकाओं को नष्ट करने की दिशा में कार्य करते हैं। इनका निर्माण प्रयोगशालाओं में जैवप्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी), आण्विक जीव विज्ञान (मॉलिक्यूलर बायोलॉजी) की विधियों द्वारा किया जाता है। उदाहरणार्थ- इन्टरफेरॉन, इन्टरल्यूकीन-2 तथा मोनो क्लोनल प्रतिकाय (मोनोक्लोलन एण्टी बॉडीज)। जी.एम.-सी.डी.एफ. प्रोटीन बनाई गई है जो श्वेत कणिकाओं (डब्ल्यू.बी.सी.) की संख्या में वृद्धि करती हैं तथा उन रोगियों के लिये लाभदायक हैं जिन्हें श्वेत कणिकाओं को नष्ट करने वाली औषधियाँ दी जाती है।

ब. डिफरेन्शियेटिंग एजेन्ट्स - ये एक नई श्रेणी की औषधियाँ बनाई जाती हैं जो कैन्सर वाली कोशिकाओं को सामान्य कोशिकाओं में परिवर्तित कर देती हैं। रीटिनॉयड्स नामक इस प्रकार की औषधि का प्रयोग तीव्रश्वेत रक्तता, गर्भाशय ग्रीवा, त्वचा आदि के कैन्सर के उपचार हेतु किया जा रहा है।

स. रोगक्षमता विज्ञान (इम्यूनोलॉजी) - शोध द्वारा पता लगाया गया है कि अनेक कैन्सर कोशिकाओं में कुछ ऐसे पदार्थ होते हैं जो शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ा देते हैं जिससे कैन्सर से बचाव संभव हो सकता है।

द. पोषण - विटामिन ए व सी की भारी मात्रा प्रयोगशाला में जन्तुओं में कैंसर को रोकती हुई (अध्ययनों के दौरान) देखी गयी है। कुछ भोज्य पदार्थ जैसे- गोभी, बंधा, पालक, गाजर, फल, आटे की ब्रेड, अनाज, सी-फूड कैन्सर को रोकने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। कम वसा का सेवन भी कैन्सर को रोकता देखा गया है। (इससे अधिक औषधियों पर चर्चा लेखक के चिकित्साशास्त्री न होने के कारण अधिकार क्षेत्र के बाहर है)।

8. कैन्सर से कैसे बचें? - यद्यपि यह बहुत सी कठिन बात है कि कैन्सर की रोकथाम के बारे में कुछ कहा जा सके फिर भी कई प्रयास इस दिशा में किये जा रहे हैं। मोटे तौर पर निम्नलिखित निर्देश इसके खतरे से बचाव में संभवतः सहायक सिद्ध हो सकते हैं, ऐसा अनेक वैज्ञानिकों का मत है।

1. नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम, जिस रूप में आप कर सकें, अवश्य करें।
2. वसायुक्त भोजन जैसे मक्खन, डेरी उत्पादन कम मात्रा में ही लें।
3. अपने को यथासंभव पराबैंगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट रेंज) से बचा कर रखें।
4. धूम्रपान संभव हो तो न करें, यदि करते हों तो कृपया ऐसे स्थान पर करें जिससे दूसरों की सांस में उसका धुआँ न जाये।
5. मद्यपान में संभव कटौती करें, यदि मद्यपान न करें तो बेहतर होगा।
6. स्त्रियाँ 50 वर्ष की उम्र के पश्चात गर्भाशय-ग्रीवा का नियमित परीक्षण किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ से 3-5 वर्ष में अवश्य करायें।
7. स्वतः स्तन परीक्षण नियमित रूप से करें तथा गांठ, स्राव आदि की स्थिति देखते ही स्त्रीरोग विशेषज्ञ से सलाह लें।
8. स्वस्थ भोज्य पदार्थ जैसे फल, सब्जियाँ आदि प्रचुर मात्रा में प्रयोग करें।
9. स्त्रियाँ सर्वाइकल, स्तन तथा अंडाशयी कैन्सर से बचाव हेतु कम से कम दो वर्ष तक स्तनपान अवश्य करायें, क्योंकि अध्ययनों से पता चलता है कि जो महिलाएँ अपने बच्चों को दो वर्षों तक स्तनपान कराती हैं उनमें स्तन कैन्सर की संभावना 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही 30 वर्ष की उम्र के पूर्व बच्चे पैदा कर लेने पर भी स्तन कैन्सर का खतरा कम हो सकता है।
10. अधिक पानी पिया करें जिससे मूत्राशय के कैन्सर की संभावना कम हो जाती है। कम से कम 2 लीटर पानी रोज पीना आवश्यक है।
11. मोटापे को न आने दें तो ज्यादा बेहतर होगा अतः अपने भोजन, क्रियाकलापों, व्यायाम आदि द्वारा यह प्रयास करें कि आपका बेसल मेटाबोलिक इन्डेक्स (बी.एम.आई.) 18.5-25 किलोग्राम/मीटर2 के बीच रहे।
12. ऐसा भी अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि सेलफोन का कम समय तक ही प्रयोग किया करें जिससे सिर के कैन्सर से बचा जा सके। या फिर उसे स्पीकर मोड पर अथवा ईयरफोन पर रखकर सिर से थोड़ी दूरCANCER

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