Wheat Grass Nagpur
गेहूँ का ज्वारा प्रकृति की एक अनमोल दे
06/12/2020
The Superfood that Boosts Immunity.
Mix 3g in a glass of warm water and drink, preferably in morning.
Girme's Wheatgrass
Product MRP rates:
100g bottle Rs. 500
(December offer Now just Rs. 400 only for Nagpur)
21/11/2020
व्हीटग्रास पाउडर रूप में क्यों?
आजकल व्हीटग्रास ताज़ी दूब, रस, पाउडर तथा गोलियों के रूप में उपलब्ध है | कई लोगों के मन में प्रश्न आता है की इनमें से सही पर्याय क्या है ?
व्हीटग्रास की कच्ची हरी दूब को चबाने से उसके सारे पोषक तत्व मिल जाते हैं | शुरुआत में यही पद्धती अपनाई जाती थी | फिर व्हीटग्रास का मिक्चर में रस निकालने का प्रचलन आया | लगभग ४० ग्राम दूब रोज़ चबाने के यह पर्याय बेहतर था |
घर पर ७ अलग-अलग गमलों में व्हीटग्रास उगाने की व उनका रस निकालने की विधि कई किताबों में उपलब्ध है परन्तु इसमें आने वाली परेशानियां निम्नलिखित हैं |
समय, जगह, सूर्य प्रकाश व काम करने के लिए आदमी की कमी |
गमले में उगाने के लिए लाई मिट्टी का जैविक न होना पर ऐसी मिट्टी में उगाए व्हीटग्रास कड़वे एवं रसायनों से परिपूर्ण होते हैं |
विपरीत मौसम जैसे कि अत्यधिक सर्दी, गर्मी, आद्रता एवं वर्षा के चलते इन्हें साल भर सुगमता के उगाना कठिन है |
चिड़िया, कबूतर जैसे पक्षी गमले में बोए गेहूं के बीजों को चाट कर जाते हैं |
ऐसे में दूसरा पर्याय है ताज़ी दूब या व्हीटग्रास के रस को प्रतिदिन आसपास उपलब्ध होने वाली जगह से खरीदना | गिरमेज़ व्हीटग्रास ने रोज़ ताज़ी दूब घर-घर पहुँचाने का प्रयत्न भी किया लेकिन निम्नलिखित कारणों से यह बंद करना पड़ा |
ग्राहक दूर-दूर बसे होने के कारण बहुत लम्बी दूरी तय करनी पड़ती | साथ ही ग्राहकों के नियमित न होने से व उनके दैनिक कार्यक्रमों में होने वाले फेर बदल से दूब बेकार हो जाती है और खर्चा भी बढ़ता |
इस वजह शहरों में प्रतिदिन 40 ग्राम व्हीटग्रास की कीमत 600 से 750 रूपए प्रतिमाह का खर्चा ग्राहकों को भरना पड़ता है |
व्हीटग्रास को संग्रहित करने के लिए फ्रिज, मिक्सर व बिजली का होना |
रस छानते हुए तंतुओं के साथ साथ कई पौष्टिक तत्व भी निकल जाते हैं, जिस कारण से पूरे फायदे नहीं मिल पाते |
कई जगह गिलासों व थैलियों में व्हीटग्रास रस (10 रुपये ) बिकता है | हालांकि इस रस की गुणवत्ता अच्छी हो सकती है लेकिन इसमें दूब की मात्रा जरुरत (40 ग्राम) के काम होती है | 40 ग्राम ताज़े व्हीटग्रास सुखाने पर 3 ग्राम (1 चम्मच) पाउडर प्राप्त होती है |
ताज़ी दूब या रस को दूर दराज़ के इलाको में पहुँचाना मुश्किल होता है | जिससे ज़रूरतमंद लोग इसके फायदों से वंचित रह जाते हैं |
कई लोगों को व्हीटग्रास का रस रुचिकर नहीं लगता |
05/10/2020
उगाने की विधि
घर पर गेहूँ के ज्वारे बनाना के लिए इन चीजों की आवश्यकता होगी।
1-अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के बीज।
2-अच्छी उपजाऊ मिट्टी और उम्दा जैविक या गोबर की खाद।
3-मिट्टी के 10-12” व्यास के 3-4” गहरे सात गोलाकार गमले जिसमें भी नीचे छेद हों। आप अच्छे प्लास्टिक की 20”x10”x2” नाप की गार्डनिंग ट्रे, जिसमें नीचे कुछ छेद हो, भी ले सकते है। गेहूँ भिगोने के लिए कोई पात्र या जग।
4-मिक्सी या ज्यूसर।
5-पानी देने के लिए स्प्रे-बोटल या पौधों को पानी पिलाने वाला झारा व कैंची।
विधि
1- हमेशा जैविक बीज ही काम में लें, ताकि आपको हमेशा मधुर व उत्कृष्ट रस प्राप्त हो जो विटामिन और खनिज से भरपूर हो। रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक जग में भिगो कर रख दें।
2- सभी गमलों के छेद को एक पतले पत्थर के टुकड़े से ढक दें। अब मिट्टी और खाद को अच्छी तरह मिलाएं। गमलों में मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और पानी छिड़क दें। ध्यान रहे मिट्टी में रासायनिक खाद या कीटनाषक के अवशेष न हों और हमेशा जैविक खाद का ही उपयोग करें। पहले गमले पर रविवार, दूसरे गमले पर सोमवार, इस प्रकार सातों गमलो पर सातों दिनों के नाम लिख दें।
3- अगले दिन गेहुंओं को धोकर निथार लें। मानलो आज रविवार है तो उस गमले में, जिस पर आपने रविवार लिखा था, गेहूँ एक परत के रूप में बिछा दें। गेहुंओं के ऊपर थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से सींच दें। गमले को किसी छायादार स्थान जैसे बरामदे या खिड़की के पास रख दें, जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता हो पर धूप की सीधी किरणे गमलों पर नहीं पड़ती हो। अगले दिन सोमवार वाले गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज एक गमले में गेहूँ बोते रहें।
4- गमलों में रोजाना कम से कम दो बार पानी दें ताकि मिट्टी नम और हल्की गीली बनी रहे। शुरू के दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से भी ढक सकते हैं। जब गैहूँ के ज्वारे एक इंच से बड़े हो जाये तो एक बार ही पानी देना प्रयाप्त रहता है। पानी देने के लिए स्प्रे बोटल का प्रयोग करे। गर्मी के मौसम में ज्यादा पानी की आवश्यकता रहती है। पर हमेशा ध्यान रखे कि मिट्टी नम और गीली बनी रहे और पानी की मात्रा ज्यादा भी न हो।
5- सात दिन बाद 5-6 पत्तियों वाला 6-8 इन्च लम्बा ज्वारा निकल आयेगा। इस ज्वारे को काट ले और पानी से अच्छी तरह धो लीजिए। इस तरह आप रोज एक गमले से ज्वारे तोड़ते जाइये और रोज एक गमले में ज्वारे बोते भी जाइये ताकि आपको निरन्तर ज्वारे मिलते रहे।
6- अब धुले हुए ज्वारों की जड़ काट कर अलग कर दें तथा मिक्सी के छोटे जार में थोड़ा पानी डालकर पीस लें और चलनी से गिलास में छानकर प्रयोग करे। ज्वारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा पर निखार लाने के लिए मल सकते हैं। आप हाथ से घुमाने वाले ज्यूसर से भी ज्यूस निकाल सकते हैं।
04/10/2020
सेहत के फायदे
गेहूं के ज्वारों में शुद्ध रक्त बनाने की शक्ति होती है, तभी तो इन ज्वारों के रस को `ग्रीन ब्लड′ कहा गया है। इसे ग्रीन ब्लड कहने का एक कारण यह भी है कि गेहूं के ज्वारे के रस और मानव रूधिर दोनों का पी.एच. फैक्टर 7.4 ही है, जिसके कारण इसके रस का सेवन करने से इसका रक्त में अभिशोषण शीघ्र हो जाता है।
गेहूं के ज्वारे का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है क्लोरोफिल। यह क्लोरोप्लास्ट नामक विशेष प्रकार के कोषो में होता है। क्लोरोप्लास्ट सूर्य किरणों की सहायता से पोषक तत्वों का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि डॉक्टर वर्शर क्लोरोफिल को `सकेन्द्रित सूर्य शक्ति′ कहते हैं। वैसे तो हरे रंग की सभी वनस्पतियों में क्लोरोफिल होता है, किन्तु गेहूं के ज्वारे का क्लोरोफिल बड़ा ही श्रेष्ठ होता है। क्लोरोफिल के अलावा इसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम और एंटी-ऑक्सीडेंट भी होता है।
गेहूं के ज्वारे रक्त व रक्तसंचार संबंधी रोगों, रक्त की कमी, डायबिटीज, कैंसर, त्वचा रोग, मोटापा, किडनी और पेट संबंधी रोग के उपचार में लाभकारी हैं।
गेहूं के ज्वारे में क्षारीय खनिज होते हैं, जो अल्सर, कब्ज और दस्त से राहत प्रदान करता है। यह एग्जिमा, सर्दी-खांसी और दमा में लाभकारी हैं। मौसमी बीमारियों के साथ-साथ यह मलेरिया में लाभकारी है। डेंगू में प्लेटलेट्स बढ़ाने में मदद करता है।
थायराइड, हृदयरोग व रक्तचाप में भी लाभकारी है, क्योंकि यह कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखता है।
रोगी के अलावा स्वस्थ्य व्यक्ति भी इसका सेवन कर सकता है। इसका रस पाचन क्रिया को तेज करता है। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, शरीर से दूषित पदार्थ बाहर निकालकर शरीर को मजबूत बनाता है और तुरंत शक्ति प्रदान करता है।
गेहूं के ज्वारे को चबाने से गले की खराश और मुंह की दुर्गंध दूर होती है। इसके रस के गरारे करने से दांत और मसूड़ों के इन्फेक्शन में लाभ मिलता है। त्वचा पर ज्वारे का रस लगाने से त्वचा में चमक आती है।
03/10/2020
व्हीटग्रास का इतिहास
आधुनिक काल में व्हीटग्रास को लोकप्रिय बनाने का श्रेय बोस्टन, अमेरिका की डॉ ऐन विग्मोर (१९०९-१९९४) को दिया जाता है | व्हीटग्रास पर विस्तृत परीक्षण कर उनके रोग निवारक गुणों का अध्ययन करने वाली वह पहली व्यक्ति थीं | उनका मत था की व्हीटग्रास “एक सम्पूर्ण आहार है” जिसमें सभी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद हैं |
डॉ ऐन विग्मोर का जन्म लिथुआनिया यूरोप में हुआ | बचपन से ही कई विकारों से ग्रसित थीं | वह अपनी दादी जो की जड़ी बूटियों के औषधीय गुणों से परिचित थी, की देखरेख में बड़ी हुई | प्रथम विश्व युद्ध के दौरान नन्ही ऐन की प्राकृतिक चिकित्सा से मुलाक़ात तब हुयी जब इन्होनें देखा की उनकी दादी ज़ख़्मी सैनिकों के घाव पर शाक व दूब के लेप लगाकर उन्हें ठीक करती थी |
जब वह १६ वर्ष की थी तब विग्मोर परिवार बोस्टन अमेरिका में जा बसा | वहां की नई जीवन व खाद्य शैली ऐन को रास नहीं आई और उन्हें बड़ी आंत का कैंसर को गया | उसी समय एक कार दुर्घटना में उनके घुटने बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए | ज़ख्म ज्यादा खराब होने से उनमें गैंगरीन हो गयी और डॉक्टरों ने पैर काटने का सुझाव दिया | ऐन को अपनी दादी की तरह निसर्गोपचार पर पूरा भरोसा था | उन्होंने अपने माता - पिता की इच्छा की विरुद्ध स्वयं ही अपने घावों पर निसर्गोपचार करने का निर्णय लिया |
डॉ ऐन को पूरा भरोसा था की प्रकृति के पास हर बीमारी का इलाज है | बचपन में देखे ज़ख़्मी सैनिक और दादी के इलाज ने उन पर गहरा प्रभाव छोड़ा था | साथ की बाइबल में लिखे बेबीलॉन के राजा नेबूचंदनेज़र पागल हो जाने पर ७ साल तक जंगली जानवर की तरह इधर उधर घूमता रहा | खाने के लिए के लिए उसके पास खेतों में उगी घास खाने के सिवा कोई चारा न था | पर यही खा-खाकर वह फिर से स्वस्थ हो गया |
स्वयं का उपचार खुद करने की ज़िद में उन्होनें व्हीटग्रास का रस पीना व उसे घावों पर लगाना शुरू किया | जल्द ही उनके घाव पूरी तरह से भर गए | पैर काटने की सलाह देने वाले डॉक्टर भी अचंभे में पड़ गए | उन्होंने ऐन को पूर्ण स्वस्थ घोषित किया व एक दिन ऐन ने बोस्टन की मैराथन दौड़ में भाग लेकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया |
डॉ ऐन विग्मोर ने अनुभव किया कि व्हीटग्रास के उपचार से न सिर्फ उनका गैंगरीन ठीक हो गए था बल्कि बचपन के विकार भी ठीक हो गए थे | इससे प्रेरित हो वह अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और तो और उनके पालतू पशुओं को भी इसे लेने की सलाह देने लगी, जिसके प्रभाव संतोषजनक थे |
अब तो डॉ ऐन की इसमें रूचि बढ़ती ही गई और उन्होंने इसका विस्तृत अध्ययन करने का निर्णय लिया | इसके लिए उन्होंने विश्व-प्रसिद्ध दूब विशेषज्ञ डॉ जी एच इर्प थॉमस का सहारा लिया | डॉ थॉमस ४० वर्षों से विभिन्न प्रकार की दूबों का अध्ययन कर रहे थे | अंत में दोनों इस नतीजे पर पहुंचे कि व्हीटग्रास को “जॉइटिंग” के चरणों में काटे जाने पर, यह सबसे ज्यादा पोषक तत्वों से परिपूर्ण होती है व अन्य सभी प्रकार की दूबो एवं प्राकृतिक विकल्पों से बेहतर होती हैं |
सन १९५७ में डॉ ऐन विग्मोर ने निसर्गोपचार व प्रमुख रूप से व्हीटग्रास चिकित्सा से होने लाभों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए “हिप्पोक्रेट्स हेल्थ इंस्टीट्यूट” की बोस्टन अमेरिका में स्थापना की | उन्होंने भारत सहित कई अन्य देशों में निसर्गोपचार पर व्याख्यान दिए तथा इस विषय पर की गई अपनी खोजों पर १५ से अधिक किताबें भी लिखीं | १९९४ में उनके संस्थान में लगी एक भयानक आग की चपेट में आकर उनकी आकस्मिक मृत्यु हुई |
१९८६ में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई जो स्वयं निसर्गोपचार में गहरा विश्वास रखते थे, के निमंत्रण पर डॉ ऐन विग्मोर भारत आईं थीं | यहाँ उन्होंने बॉम्बे हॉस्पिटल में निसर्गोपचार पर एक शिविर आयोजित किया | इस शिविर में लोकप्रिय सिने कलाकार श्री अशोक कुमार सहित ३ से ७० वर्ष तक की आयु के लोगो ने भाग लिया | इन सभी ने ४० दिन तक निसर्गोपचार का पालन किया जिसमे सुबह चलना, योग, कच्चा भोजन, व्हीटग्रास का रस, व्याख्यान व आराम शामिल था | इन दिनों सभी को दूध चाय कॉफ़ी एवं पके खाने से दूर रखा गया | शिविर समाप्त होने पर सभी का मानना था कि वे अपनी तकलीफों से लगभग ५०% निजात पा चुके थे, पहले से बेहतर तरोताज़ा, चपल, शांत व उत्साह से भरा महसूस कर रहे थे |
28/09/2020
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