Okay Nature
We manufacture ayurvedic Shampoo and Hair Oil which are made with suited herbs in perfect measurement
06/03/2023
What Okay Nature Hair Shampoo does -
- Get rid of Dandruff
- Reduce Hair Fall
- Grow back healthy and Stronger Hair
- Nourishes Scalp and Hair
- Stop hair graying ( properties of Amla and Mendi and other herbs in a right proportion can stop hair whitening and reverse it into black )
*One Solution of all Hair Problems is Okay Nature Nature Hair Shampoo.*
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( Our 100% percent customer review is positive because We don't sell chemicals, we sell herbs made Shampoo. )
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28/02/2023
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10/02/2023
Okay Nature Veda Shampoo contains selective herbs in a perfect measurement which can help to -
1. Get rid of dandruff,
2. Control Hair fall,
3. Grow back better and stronger hair,
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It is a *One Solution for All Hair Problems*.
It does not contain chemicals like -
SLS, Paraben, Sulfate, Silicone, Artificial Colour, Artificial Fragrance, Preservatives and many more harmful chemicals for your hair, scalp and skin.
*But*
It contains herbs like -
1. Amla which is rich in vitamin C as well as lots of essential fatty acids. It Strengths hair follicles. It increases blood circulation in the scalp which helps to get rid of dandruff.
2. Haritaki : There is a saying in ayurveda for Haritaki -
यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी।
अर्थात् हरीतकी मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली है।
It fights fungal infection, prevents dandruff, promote hair growth, prevents split ends and many more.
3. Bibhitaki is same in quality as amla and Haritaki but with less.
( Amla, Haritaki and Bibhitaki ( mixed in a right proportion ) is a 'उत्तम कोटी रसयान'। best for treating wounds, for treating rot skin etc. )
4. Brahmi is a best herb that gives the nourishment to the hair. It also makes the follicles and roots stronger, helping better and stronger hair to grow back. It also prevents the existing hair from falling.
5. Tulsi also known as 'The incomparable one'. It is rich in vitamin A, C and K and minerals.
It is antibacterial, antiviral, antiprotozoal, anti-oxidant, anti-inflammatory, chemopreventive and radioprotective.
Anti oxidant presents in tulsi is very useful in treating premature graying of hair as well as hair fall.
Tulsi reduces itchiness and dryness, strengthens the hair follicles and makes the roots healthy.
6-7. Reetha and Shikakai have cleansing properties. As per the World Health Organization 'has a balanced amino acid composition.'
Shikakai contains vitamin A, C, D, E, K.
( When there isn't enough vitamin D in your system, new hair growth can be stunted. )
8. Methi Dana is a powerful herb to cure dandruff or a dry itchy scalp. It also cures hair thinning.
9. Stone flower works wonders in healing wounds on external tissues of skin. It also possesses amazing antimicrobial properties that thwart infections from stemming in the exposed areas of injured skin.
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Whatsapp : 8192922592
Email : [email protected]
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07/01/2023
Okay Nature Veda Shampoo is the one that will help to get rid of dandruff, maintain hair fall, helps to grow back black and healthy hair, stop premature greying.
What we say, that we give.
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हरीतकी को वैद्यों ने चिकित्सा साहित्य में अत्यधिक सम्मान देते हुए उसे अमृतोपम औषधि कहा है। राज बल्लभ निघण्टु के अनुसार -
यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी।
कदाचिद् कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी ॥
हरीतकी मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली है। माता तो कभी-कभी कुपित भी हो जाती है, परन्तु उदर स्थिति अर्थात् खायी हुई हरड़ कभी भी अपकारी नहीं होती।
दो प्रकार के हरड़ बाजार में मिलते हैं - बड़ी और छोटी। बड़ी में पत्थर के समान सख्त गुठली होती है, छोटी में कोई गुठली नहीं होती, वैसे फल जो गुठली पैदा होने से पहले ही पेड़ से गिर जाते हैं या तोड़कर सुखा लिया जाते हैं उन्हें छोटी हरड़ कहते हैं। छोटी हरड़ का उपयोग अधिक निरापद माना जाता हैं क्योंकि आँतों पर उनका प्रभाव सौम्य होता है, तीव्र नहीं।
औषधि प्रयोग हेतु फल ही प्रयुक्त होते हैं एवं उनमें भी डेढ़ तोले से अधिक भार वाली भरी हुई, छिद्र रहित छोटी गुठली व बड़े खोल वाली हरड़ उत्तम मानी जाती है। भाव प्रकाश निघण्टु के अनुसार जो हरड़ जल में डूब जाए वह उत्तम है।
इसमें लवण रस के अतिरिक्त अन्य सभी रस (स्वादु, अम्ल, तिक्त, ऊषण और कषाय ) होते है। यह लघु, अग्नि को दीप्त करती है, भोजन को पचाती है, बुद्धिवर्धक है, दीर्घायु प्रदान करने वाले द्रव्यों में सर्वश्रेष्ठ है, रेचक, आयु के लिए हितकर, बुद्धि तथा ज्ञानेन्द्रियों को बल देने वाली है।
आयुर्वेद में आठ प्रकार की चिकित्सा पद्धति का वर्णन मिलता है।
१. कायचिकित्सा ( Internal Medicine) - इसी में सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने वाले आमाशय तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि समस्त रोगों की शान्ति का उपाय किया जाता है। यह 'काय' यौवान आदि अवस्थाओं वाला हैं। इसके प्रधान तन्त्र 'अग्निवेश तन्त्र ( चरक संहिता ), भेल संहिता तथा हारीत संहिता आदि हैं।
२. बालतन्त्र या कौमारभृत्य ( Pediatrics ) - बालकों के शरीर में परिपूर्ण बल तथा धातुओं आदि का अभाव होने के कारण इसका स्वतन्त्र मिलता किया गया है। क्योंकि इनकी सभी प्रकार की औषधियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं। दूध भी इन्हे माता या धात्री ( उपमाता ) का देने की प्राचीन काल से व्यवस्था है, जिसका मिलता साहित्यिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है।
यहाँ एक शंका होती है कि बालकों की भाँति वृद्धों की चिकित्सा का भी स्वतन्त्र उपदेश आचार्यों ने क्यों नहीं किया?
इसका समाधान इस प्रकार है - वृद्धावस्था पूर्ण युवावस्था के बाद में आती है, अतः इसकी चिकित्सा का अधिकांश अंग कायचिकित्सा में ही समाविष्ट हो जाता है और कुछ अंश शेष रह जाता है, उसके निराकरण के लिए ७वें रसायानतन्त्र की व्यवस्था की गयी है। इस विषय का प्राचीन ग्रंथ केवल 'काश्यप संहिता' है, जो सम्प्रति ( इस समय ) खण्डित उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त चरक-शारीर अध्याय ८ तथा चरक-चिकित्सास्थान अध्याय ३०, सुश्रुत-शारीरस्थान अध्याय १० में प्राप्त होती हैं।
३. ग्रहचिकित्सा / भूतविद्या ( Psychiatry and Exorcism ) - इसमें देव, असुर, पूतना आदि ग्रहों से गृहीत ( आविष्ट ) प्राणियों के लिए शान्तिकर्म की व्यवस्था की जाती है। इनमें बालग्रह तथा स्कन्दग्रहों का भी समावेश है, साथ ही इनकी शान्ति के उपायों की भी चर्चा की गयी है। इस विषय का आज कोई प्राचीन स्वतन्त्र तन्त्र उपलब्ध नहीं है। केवल चरक संहिता-निदानस्थान ७.१०-१६, चरक चिकित्सास्थान ९.१६-२१ और सुश्रुत संहिता-उत्तरतन्त्र अध्याय २७ से ३७ तक अध्याय ६० में भूतविद्या का वर्णन मिलता है।
४. शालाक्य तन्त्र ( ENT and Ophthalmology ) - उध्र्वजत्रुगत ( ENT ) आँख, मुख, श्रोत्र, नासिका आदि में आधारित रोगों की शलाका आदि द्वारा की जाने वाली चिकित्सा ही इस तन्त्र का प्रधान क्षेत्र है। शालाक्य तन्त्र के नाम से आज कोई ग्रन्थ स्वतन्त्र रूप से नहीं मिलता। सुश्रुत संहिता के उत्तर तन्त्र के अध्याय १ से १९ तक में उत्तमांग ( शिरःप्रदेश ) में स्थित नेत्र रोगों का, २० तथा २१ वें अध्यायों में कर्णरोगों का, २२ से २४ तक नासारोगों का और २५ एवं २६ वें अध्यायों में शिरोरोगों का वर्णन किया है। चरक की प्रतिज्ञा के विरुद्ध था शालाक्य तन्त्र पर विस्तारपूर्वक कुछ कहना। जैसे कि उन्होंने कहा है - 'पराधिकारे तु न विस्तरोक्तिः शस्तेति तेनाअयत्र नः नः प्रयासः।' अतएव वह इसके विस्तार में नहीं गये।
५. शल्यतन्त्र - यह आठों तन्त्रों में सबसे प्रधान है। क्योंकि प्रथम देवासुर-संग्राम में युद्ध में घावों की सद्यःपूर्ति के लिए इसी की आवश्यकता पड़ी थी। उस समय देव वैद्य अश्विनी कुमारों ने इस तन्त्र का समुचित प्रयोग कर दिखाया था। आज भी शल्य चिकित्सक - कुशल चिकित्सक उनका प्रतिनिधित्व करते ही हैं। भगवान धन्वंतरि का अवतार शल्य आदि अंगों की पुनः प्रतिष्ठा के लिए ही हुआ था। ( सुश्रुत संहिता १.२ )। काय चिकित्सा प्रधान चरक संहिता में भी अर्श, उदर तथा गुल्म आदि रोगों में शल्यकर्म विशेषज्ञ से सहायता लेने का संकेत है। मूलतः शल्यतन्त्र में यंत्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि के प्रयोगों का निर्देश मिलता है।
६. दंष्ट्राविषचिकित्सा / अगदतन्त्र - महर्षि वाग्भट द्वारा रचित दोनों संहिताओं ( अष्टांग संग्रह तथा हृदय ) में अष्टांग ( आठ अंग ) रूपी आयुर्वेद का विभाजक सूत्र अविकल रूप से प्राप्त होता है। इससे हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि इन्होंने सुश्रुत संहिता को आदर्श मानकर 'सर्पकीटलूती' आदि में प्रथम परिगणित 'सर्प' शब्द को प्रमुख मानकर 'दंष्ट्रा' शब्द का प्रयोग किया होगा। क्योंकि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' यह सूत्र सर्वत्र अपनाया जाता है और सभी प्रकार के विषों में 'पीड़ाकरणसामान्य' गुण तो होता ही है।
अगदतन्त्र उसे कहते हैं जिसमें सर्प आदि जंगम तथा वत्सनाभ ( एक अति विषेली जड़ी बूटी है ) आदि स्थवार विषों के लक्षणों का एवं विविध प्रकार के मिश्रित विषों का वर्णन तथा उन-उनके शान्ति ( शमन ) के उपायो का वर्णन हो।
अगद शब्द औषद का पर्याय है। सुश्रुत का सम्पूर्ण कल्पस्थान अगदतन्त्र है, जैसे कि सुश्रुत-सूत्रस्थान ३.२८ में कहा गया है - 'अष्टौ कल्पाः समाख्याता विषभेषजकल्पनात्'।। इति। चूँकी इस कल्पस्थान में विषचिकित्सा की ही कल्पना की गयी है, अतः इसका नाम कल्पस्थान है। इस सन्दर्भ में चरक-चिकित्सास्थान का 'विषचिकित्सा' नामक २३ वाँ अध्याय भी अवलोकनीय है।
७. जरा चिकित्सा / रसायनतन्त्र - रसायनतन्त्र उसे कहा गया है जो वयःस्थापन ( कुछ समय के लिए पुनः यौवन को स्थिर करने में सहायक ) होता है, आयु को बढ़ाता है, मेधा ( धारणाशक्तियुक्ता धीः ) अर्थात् जो धारणा शक्ति तथा सभी प्रकार के बल को बढ़ाने एवं रोगों का विनाश करने में समर्थ हो। इस प्रकार का भी कोई प्राचीन स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता।
८. वृषचिकित्सा / वाजीकरणतन्त्र - 'अवाजी वाजीव अत्यंतर्थं मैथुने शक्तः क्रियते येन तद् वाजीकरणम्'। वाजीकरणतन्त्र उसे कहते हैं जो अल्प मात्रा वाले शुक्र ( वीर्य ) का सन्तपर्ण करता है, दूषित शुक्र को शुद्ध करता है, क्षीण शुक्र को बढ़ाता है और सूखे हुए शुक्र के उत्पादन के उपायों का निर्देश करता है। लिंग में प्रहर्षता को उत्पन्न कर पुरुष-स्त्री में संतानोत्पादन शक्ति को पैदा करता है। 'वर्षति इति वृषः' इस अभिप्राय से भले ही इस तन्त्र को 'वृषचिकित्सा' कहा जाय, अन्यथा वृष ( साँड़ ) जिन चेष्टाओं के बाद सोच-समझकर मैथुन में प्रवृत्त होता है, उसे सुश्रुत ने सौगन्धिक नामक नपुंसक कहा है। ( सुश्रुत-शारीरस्थान २.३९ )। इस विषय से सम्बन्धित भी कोई प्राचीन ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। इसके लिए केवल चरक-चिकित्स्थान २ तथा ३०.१२६ से २०३ तक के पद्य एवं सुश्रुत-शारीरस्थान २ तथा सुश्रुत-चिकित्स्थान २६ का अवलोकन करें।
वृष का अर्थ है - 'वर्षतीत वृषः' अर्थात् जो योनि में वीर्य की वर्षा करें। किन्तु वह वृष ( साँड़ ), वाजी ( घोडे़ ) के समान वेग वाला नहीं होता। अतः अधिकांश क्षेत्रों में 'वाजीकरण' शब्द ही प्रसिद्ध हैं।
आयुर्वेद क्या है?
आयु अर्थात् जीवन + वेद अर्थात् ज्ञान। आयुर्वेद अर्थात् जीवन जीने का ज्ञान।
प्राणो हि यस्माद्भूतानां प्राणिनामायुर्जीवनम्। अर्थात् प्राण ही प्राणियों का आयु - जीवन है।
"यावद्धयस्मिञ्शरीरे प्राणो वसति तावदायुः। ( कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् ३.२ ) अर्थात् जब तक इस शरीर में प्राण रहता है तभी तक आयु है।" इस श्रुति से सिद्ध होता है।
आयुर्वेद हमें रोग से पीड़ित होने पर औषधि देकर मात्र स्वस्थ करने की विधा ही नहीं अपितु हम जीवन परियन्त्र आरोग्य रहे ऐसी जीवनशैली प्रदान करने वाली स्वस्थ विधा है।
आयुर्वेद ने रोगों को ३ भागों में विभाजित किया है -
१. कफ,
२. पित्त,
३. वात ।
हृदय से ऊपरी भाग में कफ, हृदय के मध्य भाग से नाभि तक पित्त और नाभि से निचले भाग में वात का आश्रयस्थान है।
पंचमहाभूतों में आकाशतत्त्व अवकाश ( खाली स्थान ) के रूप में शरीर में रहता है और पृथिवीतत्त्व आधारस्वरूप है, अतएव ये दोनों निष्क्रिय हैं, अर्थात् इन दोनों में किसी प्रकार की क्रिया नहीं होती है। शेष तत्त्वों का विवरण इस प्रकार है - जलतत्त्व 'कफ', अग्नितत्त्व 'पित्त' और वायुतत्त्व 'वात' है।
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