PRAN AYUR TIPS

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आयुर्वेदिक (एम o डी o)
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डॉ प्राणेश्वर पासवान
आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी
बिहार सरकार

Photos from PRAN AYUR TIPS's post 26/01/2026

Republic day at APHC, BARAIL.

24/01/2026

स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन के लिए आवश्यक समुचित आहार और निद्रा के साथ ही *ब्रह्मचर्य* का सयंम भी अनिवार्य है।
यों तो *ब्रह्मचर्य* का शाब्दिक अर्थ ब्रह्म अर्थात परमात्मा और चर्य अर्थात विचरण करना। इस प्रकार ब्रह्मचर्य का अर्थ होता है - *परमात्मा में विचरण करना* अर्थात इन्द्रियों को सांसारिक विषयों से हटाकर मन से परमात्मा का चिंतन- मनन करना।
अब ब्रह्मचर्य के लोक प्रचलित अर्थ पर विचार करते हैं। इसके अनुसार ब्रह्मचर्य का अभिप्राय है विषयइन्द्रिय के सुख का संयम के साथ सन्तुलित उपयोग।
सृष्टिक्रम को जारी रखने के लिए युवावस्था में प्राणी का दायित्व होता है संतान उत्पन्न करना। अतएव युवावस्था में विवाहोपरांत संतानोत्पत्ति के लिए ही कामसुख का सीमित उपभोग ब्रह्मचर्य है।यह प्राणी को पितृऋण से मुक्त करता है।

स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन के लिए आवश्यक ब्रह्मचर्य के सामान्य परिचय के बाद इसके प्रकार पर विचार प्रस्तुत है।

ब्रह्मचर्य के निम्न दो प्रकार हैं-
1. *विद्यार्थी जीवन का ब्रह्मचर्य*-
सनातन संस्कृति में विद्याध्ययन को कठोरतम तप कहा गया है। प्राचिन काल में परिवार से दूर गुरु के आश्रम में इन्द्रिय सुखों पर नियन्त्रण के साथ शिष्य विद्यारत होते थे। जन्म से 25 वर्ष तक की इस अवस्था को ब्रह्मचर्य आश्रम कहा गया। इस आश्रम में स्त्री पुरुष का अंतर ज्ञात नहीं होता था। इसके विपरीत आज की शिक्षा पद्धति में इन्द्रिय सुख के उपभोग के कारण शुक्र धातु के अतिछरण से विद्यार्थी जीवन ओज एवं तेज विहीन हो रहा है।
2. *गृहस्थ आश्रम का ब्रह्मचर्य*-
यह 26 वर्ष से आगे 50 वर्ष तक गृहस्थ आश्रम और इसके भी आगे 70 वर्ष की अवस्था तक विवाहित जीवन मे सन्तानोतपति हेतु सीमित कामसुख का उपभोग इस प्रकार में आता है। 51 वर्ष से 75 वर्ष तक कि उम्र वानप्रस्थ एवं इसके आगे 100 वर्ष तक की अवस्था सन्यास आश्रम कही गई है।

स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन के लिए ब्रह्मचर्य का संयम पुरुषों की तरह ही स्त्रियों के लिए भी पालन योग्य है।

सम्यक आहार एवं निद्रा से जहाँ सप्त धातुओं का निर्माण और पोषण सम्यक रूप में होता है, वहीं ब्रह्मचर्य के कारण वह शक्ति (ओज) के रूप में संरक्षित रहता है। इसीलिए आयुर्वेद में कहा है-
*मरणं बिंदु पातेन जीवनं बिंदु धारनात।*
अतएव पूरी दृढ़ता से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए

स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन लिए दिनचर्या के संदर्भ में प्रथम बिंदु *ब्रह्म मुहूर्त में जागना (शय्या त्याग)* का विवेचन कर रहे हैं।

यहाँ प्रथम ब्रह्म मुहूर्त को स्पष्ट करना अनिवार्य है। शास्त्रों के अनुसार सूर्योदय से चार घड़ी (96 minute) अर्थात लगभग डेढ़ घंटे पहले से लेकर सूर्योदय होने तक के समय को ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है। ये ब्रह्म मुहूर्त का समय भौगोलिक स्तिथि एवं ऋतु परिवर्तन के साथ बदलता रहता है। भारत की भौगोलिक स्तिथि एवं ऋतु के अनुसार सामान्यतः सामान्यजन के लिये *प्रातः चार बजे से साढ़े पांच बजे* के मध्य के समय को ब्रह्म मुहूर्त कहना उचित होगा। अतः स्वस्थ व्यक्ति को प्रातः 4 बजे से 5:30 बजे के मध्य अवश्य जाग जाना चाहिए।
ब्रह्म मुहूर्त में क्यों जागना चाहिए एवं इसके लाभ क्या हैं, इसकी विवेचना

स्वस्थ दीर्घ जीवन के लिए ब्रह्म मुहूर्त में क्यों जागना चाहिए?

इसका समाधान कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है-
पंचभौतिक सृष्टी में शरीर भी पञ्चभौतिक है। पंचभौतिक शरीर के सतत पोषण और वर्द्धन के लिए इन्हीं पांच महाभूतों (पृथ्वी,जल, अग्नि, वायु और आकाश) की आवश्यकता होती है। उक्त पांचो की शुद्धता के स्तर से शरीर का पोषणादि प्रभावित होता है। इसीलिए इन्हें पंचामृत भी कहा गया है। ब्रह्म मुहूर्त में स्वभावत: उक्त पन्चामृत की गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है, अर्थात ये वायु-जल आदि प्रदूषण रहित होते हैं। अतः ब्रह्म मुहूर्त में जागने से शरीर को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। इसीलिए प्राणियों को सावधान करने हेतु एक भजन में कुछ पंक्तियाँ यूँ कही गई हैं- *उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहाँ जो सोवत है। जो सोवत है, सो खोवत है जो जागत है, सो पावत है।* इसका मतलब है जो लोग सूर्योदय से पहले जाग जाते हैं, वे स्वास्थ्य रूपी अनमोल धन प्राप्त करते हैं जब कि सूर्योदय के बाद भी अधिक देर तक सोते रहने वाले पहला सुख-निरोगी काया से वंचित रहते हैं। अतः स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में निर्धारित समय पर शय्या त्याग कर उठ जाना चाहिए।
अब ब्रह्म मुहूर्त में जागने से होने वाले कतिपय लाभ निम्नलिखित हैं-
१. इससे हमें प्रदूषण रहित वातावरण अर्थात शुद्ध वायु- प्रकाश आदि की प्राप्ति होती है जिससे शरीर में प्राणऊर्जा का संचार होता है, परिणामतः शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
२. उदयमान सूर्य की परा बैंगनी किरणों के प्रभाव से शरीर में विटामिन D, E के निर्माण से, इनकी कमी से होने वाले रोगों से बचाव होता है। जैसे-अस्थिरोग, त्वचा रोग, नेत्र रोग आदि। यही कारण है कि आज की आराम तलब जीवन शैली के कारण सूर्योदय के बाद तक सोने वाले लोगों में उक्त रोग बहुतायत में मिलते हैं।
३. ब्रह्म मुहूर्त स्वभावतः वायु का काल होने नियमित रूप से इस समय जागने वाले में मल-मूत्र का सम्यक विसर्जन होकर कोष्ठ शुद्धि भली प्रकार से होती है।इसके विपरीत देर तक सोने वाले लोगों में कोष्ठबद्धता (constipation), कोष्टगत वायु प्रकोप (gastritis) आदि मिलते हैं।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए ब्रह्म मुहूर्त में जागने के साथ दूसरे बिंदु *ईशवन्दन* के तहत सर्व शक्तिमान ईश्वर का स्मरण कर उन्हें नमन करें। उनका धन्यवाद ज्ञापित करें कि उनकी महती कृपा से आज का स्वर्णिम प्रभात देखने को मिला और उनसे सभी प्राणियों के कल्याण हेतु हृदय से प्रार्थना करें। ब्रह्म मुहूर्त में की गई प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है, क्योंकि ब्रह्म का अर्थ ही परमात्मा है। इस समय सरल और शुद्ध हृदय से की गई प्रार्थना का प्रतिफल प्राणी को सुन्दर स्वास्थ्य के साथ ही जीवन यापन के लिये आवश्यक धन-धान्य के रूप में प्राप्त होता है। यहाँ प्रकृति का यह नियम लागु होता है- *हमारी स्वयं की भावना ही वापस लौट कर प्रतिफलित होती है।*
अतः सदा ही प्राणीमात्र के कल्याण के लिए परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए। ऐसी प्रार्थना अपने-अपने इष्टदेव और गुरुदेव से भी कर सकते है

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के संदर्भ में तीसरे मुख्य बिंदु *मल मूत्रादि के उत्पन्न वेग के विसर्जन* की विवेचना प्रस्तुत है।

रात्रि में 6 से 8 घण्टे की समुचित निद्रा के बाद ब्रह्म मुहूर्त में जागने और ईश वन्दन के पश्चात स्वाभाविक मल मूत्रादि का वेग यदि उतपन्न होता है तो पहले उनका विसर्जन करना चाहिए।मलमूत्रादि विसर्जन के समय निम्न नियमों का पालन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर होने से इनका कड़ाई से पालन करना चाहिए-
१. प्रात: अर्थात दिन में शौचादि के समय मुख उत्तर दिशा में तथा रात्रि में दक्षिण दिशा में रखना वास्तुशास्त्र के अनुसार अच्छा बताया गया है, अतः इसका अवश्य ध्यान रखें। इसका कारण यह है कि ऐसी स्थिति में ऊर्जा के स्रोत उदयमान सूर्य की दिशा पूर्व तथा अस्ताचलगामी सूर्य की दिशा पश्चिम आपके दाहिने होगी।अतः घरों के शौचालयों में सीट/कमोड उत्तर-दक्षिण करके लगाना चाहिए। कभी भी पूर्व-पश्चिम करके नहीं लगाना चाहिए।
२. कभी भी बिल्कुल नग्न होकर मल मूत्र आदि का विसर्जन नहीं करना चाहिए।
३. खड़े-खड़े मल मूत्रादि का विसर्जन यथाशक्य न करें।
४. शौच के समय शिर को स्वच्छ वस्त्र से ढक लेना चाहिए। ऐसा करने से केश (बालों) द्वारा होने वाले संक्रमण से बचाव होता है।५. मौन रहकर शौच क्रिया करनी चाहिए, बल्कि ऊपर- नीचे की दन्त पँक्ति को एक दूसरे से सटाकर रखना चाहिये। ऐसा करने से दाँत लम्बी आयु तक दृढ़ और मजबूत बने रहते हैं।
६. मल विसर्जन के बाद स्वच्छ जल से अच्छी तरह गुद प्रच्छालन करना चाहिए, ताकि मल मार्ग से होने वाले कृमि आदि के संक्रमण से बचा जा सके।
७. गुदप्रच्छालन के बाद दोनों हाथों को एंटीसेप्टिक लोशन/साबुन से भली प्रकार से धोकर मुखप्रच्छालन (कुल्ला) करना चाहिए।
८. प्रात:काल मलमूत्रादि के विसर्जन से कोष्ठशुद्धि होकर वतानुलोमन होने से मन प्रसन्न रहता है

स्वस्थ दीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के संदर्भ में चतुर्थ बिन्दु "उष:जलपान" की विवेचना प्रस्तुत है।

इसका अभिप्राय प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में जागकर जल पीने से है। शास्त्रों के अनुसार उषा काल में ताम्रपात्र में रखा हुआ ८ प्रसृति ( 8 चुल्लू ) जल पीना स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है। रात भर ताम्रपात्र में रखा जल विसंक्रमित होकर अमृत तुल्य होता है। ताम्रपात्र के अभाव में मिट्टी पात्र में रखा हुआ जल पीना चाहिए। यहाँ जल की मात्रा आठ प्रसृति कही गई है क्योंकि प्रति व्यक्ति की चुल्लू उसके अपने शरीर के प्रमाण के अनुरूप होती है ,अतः जल की मात्रा का निर्धारण भी तदनुकूल कहा गया। यह एक वैज्ञानिक आधार है परंतु वर्तमान में यह विचार समयानुकूल नहीं लगता है, अतः आप व्यवहारिक रूप में अपनी देह प्रकृति एवं ऋतु परिवर्तन के अनुसार उष:जल पान के रूप में आवश्यकतानुसार १ से ३गिलाश जल पी सकते हैं।
शास्त्रों में उष: जलपान के निम्नलिखित लाभ बताये गए हैं-
१. मल मूत्र का सम्यक विसर्जन होने से शरीर के विषाक्त पदार्थ (toxins) बाहर निकल जाते हैं।
२. शरीर की चयापचय (metabolism) में सुधार होता है।
३. उपरोक्त दोनों लाभ के परिणाम स्वरूप रोग प्रतिरोध शक्ति विकसित होती है।
४. शरीर और मन ऊर्जावान होता है।
५. वृक्क का कार्य सुचारू होने से वृक्क अश्मरी (kidney stone) की सम्भावना नगण्य होती है।
६. त्वचा निखरती है अर्थात प्रभावान होती है।
७. शिर के बालों को पोषण मिलता है परिणामत:बाल घने, काले और मजबूत होते हैं।
८. उष:जल पान से शरीर से toxins बाहर होने के साथ metabolism में सुधार के कारण व्यक्ति शिरो रोग, नेत्र विकार, अर्श आदि उदर विकार एवं सभी रोगों से मुक्त होकर स्वस्थ दीर्घ जीवन पाता है|

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के संदर्भ में पंचम बिंदु "दन्त धावन-जिह्वा निर्लेखन-मुख प्रच्छालन" की विवेचना प्रस्तुत है।

दन्त धावन से अभिप्रेत है-दाँतों की सफाई। जिह्वा निर्लेखन का अर्थ है-जिह्वा की सफाई और मुख प्रच्छालन का मतलब है- मुख की सफाई। संक्षेप में इन तीनों की सफाई का अभिप्राय है- "मुख की स्वच्छता और स्वस्थता (ओरल हाईजीन)" से है। हम जो भी आहार ग्रहण करते हैं, वह मुख मार्ग से ही पेट में जाता है अतः यदि मुख अस्वच्छ और संक्रमित होगा तो सन्तुलित आहार भी पेट में जाकर रोगों की उत्पत्ति कर स्वास्थ्य हानि ही करेगा।
दाँत व्यक्ति के मुख की शोभा ही नहीं बल्कि पाचन तंत्र और स्वर तंत्र के भी प्रमुख अंग हैं। धवल (सफेद) दन्तपंक्ति जहाँ व्यक्तित्व को आकर्षण प्रदान करती हैं वहीँ मजबूत दाँत स्वास्थ्य दायक हैं अतः नित्य सुबह दन्त धावन करना चाहिए। इसके साथ ही रात सोने से पहले भी दाँतो की सफाई करना चाहिए ताकि दिन में लिये गए आहारादि के कण ठीक से निकल जाएं, अन्यथा ये रात्रि पर्यन्त सड़ कर संक्रमण उत्पन्न कर रोगों की उत्पत्ति करेंगे।
आयुर्वेद एवं भारतीय परम्परा में दन्त धावन के लिए विभिन्न वृक्षों की टहनियों की दांतुन और जड़ी-बूटी से निर्मित दन्तमंजन का प्रयोग उनके गुणों के अनुसार बताया गया है। व्यवहार में बहुतायत से नीम और बबुल की दांतुन ही प्रयोग की जाती है। सामान्यतः दातुन बारह अंगुल लम्बी, छोटी अंगुली के अग्र भाग के समान मोटी और अच्छी कूचि बनने वाली होनी चाहिए। दातुन एक स्थान पर स्थिर बैठ कर और मौन होकर करना चाहिए। सर्व प्रथम दातुन के अग्र भाग को दाँतो से चबाकर कुचि बना पहले नीचे की दन्तपंक्ति और फिर ऊपर की दन्तपँक्ति को धीरे धीरे घिस कर साफ करना चाहिये। इस प्रकार दांतुन करने के बाद जिह्वा- निर्लेखन (जिह्वा की सफाई) करनी चाहिए। इसके लिए दातुन को लम्बाई में चिरकर उससे भी जिह्वा की सफाई की जा सकती है। इसके अलावा चाँदी, ताम्बा, स्टेनलेस स्टील और प्लास्टिक से बनी जीभी का उपयोग किया जा सकता है। दांतुन से दन्तधावन करने वाले प्रायः दातुन से ही जिह्वा की सफाई करते हैं जब कि टूथब्रश से दन्तधावन करने वाले धातु या प्लास्टिक से बनी जीभी का उपयोग करते हैं। इस प्रकार दन्त धावन और जिह्वा निर्लेखन के बाद ताजा स्वच्छ जल से कवल (कुल्ला) कर मुख प्रच्छालन करना चाहिए। वर्तमान में अधिकांश लोग टूथपेस्ट और टूथब्रश से दन्त धावन करते हैं लेकिन इससे दाँतो की सफाई तो होती है किन्तु दाँत मजबूत नहीं होते जब कि दांतुन करते समय कूचि बनाने के कारण दाँतो का व्यायाम होने सेदाँत मजबूत होते हैं। कहा भी गया है- "मजबूत दाँत-मजबूत शरीर" (strong teeth-strong body)
इस प्रकार दांतुन से दन्तधावन, जिह्वा निर्लेखन और मुख प्रच्छालन करने से निम्नलिखित लाभ होते हैं-
१.दाँत चमकीले और मजबूत होते हैं।
२.जिह्वा की मलिनता और विरसता दूर होती है। जिह्वा सभी रसों का स्वाद ग्रहण कर पाती है।
३.मुख की मलिनता और दुर्गंध दूर होकर मुख स्वच्छ होता है।
४.उपरोक्त तीनो लाभ के कारण दन्तरोग, जिह्वारोग और मुख रोग नहीं होते।
५.जिह्वा की विरसता दूर होने से भोजन में रुचि बढ़ती है।
६.दाँतो के मजबूत होने से भोजन ठीक से चबाकर करने से पाचन सम्यक होकर स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है।
७.चमकीले दाँतों से व्यक्तित्व निखरता है।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के सन्दर्भ में छठे बिंदु "नस्य" की विवेचना प्रस्तुत है।

नस्य वह प्रक्रिया है, जिसमें दोनों नासा छिद्रों में ड्रॉपर द्वारा शुद्ध सरसों तेल / औषध सिद्ध तेल / गौघृत/ औषध सिद्ध गौघृत आवश्यकता और उम्र के अनुसार 2 से 6 बून्द की मात्रा में डालकर श्वास के द्वारा अन्दर खिंचा जाता है। चूंकि नासाछिद्र ही शिर के द्वार हैं अतः इस प्रकार लिया गया शोधन नस्य शिरोगत, नासागत, मुखगत और कंठगत दोषों का नासा सह मुख मार्ग से निर्हरण करता है। इसी तरह लिया गया बृंहण नस्य इन सभी अङ्गों को पोषित करता है।
यों तो पंचकर्म के अंतर्गत नस्य (शिरोवीरेचन) एक शोधन प्रक्रिया है, जो शिर:शूल, पुराने जुकाम आदि में शोधन चिकित्सा के रूप में की जाती है। दिनचर्या के रूप में प्रयुक्त प्रतिदिन का नस्य जहाँ स्थानीय दोषों का निर्हरण करता है, वहीँ आंख, कान ,शिर और बालों को पोषित करता है। अतः प्रतिदिन यथा आवश्यक शुद्ध सरसों तेल, षड बिंदु तेल, अणु तेल, गौ घृत और पंचगव्य घृत में से किसी एक का नियमित नस्य लेना चाहिए। नियमित नस्य के लाभ निम्नांकित हैं-
१. नाक, मुँह, कण्ठ और शिर आदि में प्रतिदिन के संचित कफ आदि दोषों के निर्हरण होकर ये अंग सुचारू रूप में कार्य करते हैं।
२. मुख सुवासित (सुगंधित) और स्वच्छ होता है।
३. स्वर में स्निग्धता आती है।
४. नेत्र, नासा, कान और जिह्वा आदि इन्द्रियाँ पोषित होकर अपने-अपने कार्य को दीर्घायु तक सुचारु रूप में करती हैं।
५. शिर के पोषित होने से मेधाशक्ति बढ़ती है।
६. असमय बालों का झड़ना और सफेद होना रुकता है।
७. चेहरे की त्वचा में असमय झुर्रियाँ, झांई आदि नहीं पड़ती हैं।
सावधान:-कुछ लोग नस्य के लिये तम्बाकू उत्पादों का प्रयोग करते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक है, अतएव ऐसा कदापि नहीं करें।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के सन्दर्भ में सप्तम बिंदु *"अभ्यंग"* की विवेचना प्रस्तुत है।

*अभ्यंग का अर्थ है*- 'मालिश करना'
आयुर्वेद जीवन शैली में दिनचर्या का अति महत्वपूर्ण बिंदु है अभ्यंग। अतः यथासंभव प्रतिदिन सम्पूर्ण शरीर की शुद्ध सरसों तेल, जैतून तेल (olive oil), बादाम तेल से मालिश करना स्वास्थ्यकर होता है। रोगविशेष में औषधसिद्ध तेल विशेष की मालिश की जा सकती है। मालिश के लिये उपयुक्त समय प्रात:स्नान से आधे घंटे पूर्व अथवा रात्रि सोने से पहले होता है।
*अभ्यंग विधि*:- १. मालिश के लिये प्रयुक्त तेल ऋतु अनुकूल उष्ण होना चाहिये। ग्रीष्म ऋतु में सामान्यतः ठंडा तेल और शीत ऋतु में थोड़ा गर्म करके मालिश करना चाहिए।
२. हाथ पैर में मालिश नीचे सेऊपर की ओर करते हुये छाती और पीठ की मालिश करें। इसके बाद शिर और चेहरे की मालिश करें।
३. मालिश में पादाभ्यंग (दोनों पैर के तलवों की मालिश), शिरोभ्यंग (शिर की अच्छी प्रकार मालिश), कर्ण अभ्यङ्ग(दोनो कानों में ५-७ बून्द सरसों तेल की डालना तथा नाभि में २ बून्द सरसों तेल की अवश्य डालनी चाहिए।
नोट:-भाग दौड़ भरी जिंदगी में यदि प्रतिदिन मालिश का समय न मिले तो साप्ताहिक अभ्यङ्ग अवश्य करना चाहिए।
*अभ्यङ्ग के लाभ निम्नलिखित हैं*:-
१. त्वचा स्निग्ध और चमकदार होती है।
२. जिस मिट्टी के पात्र में हमेशा स्नेह (घी-तेल) रखा जाता है, वह दृढ़ और मजबूत हो जाता है उसी प्रकार नियमित अभ्यङ्ग से शरीर दृढ़ (कष्टसह) और बलवान बनता है।
३.जिस प्रकार मशीन में तेल डालने से सभी पुर्जे सही तरीके से काम करते हैं,उसी प्रकार नियमित अभ्यङ्ग से शरीर के सभी अंग-प्रत्यंग सुचारू रूप में कार्य करते हैं।
४.पादाभ्यंग का प्रभाव नेत्रों पर होने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
५. कर्ण अभ्यङ्ग से कान के मल दूर होकर श्रवण शक्ति बढ़ती है।
६. नाभि में तेल डालने से नाभिभ्रंश नहीं होता तथा ओठ भी नहीं सूखते।
७. सर्वांग अभ्यङ् के फलस्वरूप शरीर में रक्त संचार सुचारू होने से ब्लड प्रेशर ठीक रहता है और मेद धातु के सुविभक्त होने से शरीर सुडौल बनता है।
८. अभ्यङ्ग से शरीर में वात नियंत्रित होती है अतः वातविकार और वृद्धावस्था में नियमित अभ्यंग करना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के सन्दर्भ में अष्टम बिंदु "व्यायाम" की विवेचना प्रस्तुत है।

निर्धारित अनुशासन में शरीर की ऐसी चेष्टा (क्रिया), जिससे शरीर में थकावट उत्पन्न होती है, उसे "व्यायाम" कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रात:घूमना (morning walk), सूर्य नमस्कार आदि योगासन और पी. टी. ये सभी आते हैं।
व्यायाम कितना करना चाहिए? इस संदर्भ में आयुर्वेद स्पष्ट निर्देश देता है कि शीत काल (ठंड के मौसम) में स्वंय के शरीर बल से आधा और ग्रीष्म ऋतु में उससे भी कम परिमाण में व्यायाम करना चाहिए। जैसे ही हृदयस्थ प्राण वायु कण्ठस्थ उदान वायु को टक्कर देने लगे अर्थात दम फुलने लगे तो समझें अर्द्ध शक्ति व्यायाम हो गया है।
इस प्रकार समुचित व्यायाम से निम्नलिखित लाभ होते हैं:-
१. व्यायाम करने से स्वेदन (पसीना) होने से शरीर के विषाक्त तत्व (toxins) बाहर होते हैं और शरीर में हलकापन आता है।
२. कठिन (कठोर) कार्य करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है।
३. पाचकाग्नि प्रबल होती है, जिससे भुख अच्छी लगती है तथा भोजन का पाचन ठीक से होता है।
४. मेद धातु घटता है, फलस्वरूप मोटापा दूर होता है।
५. शरीर सुडौल और बलवान होता है। अतः स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन सीमा में ही व्यायाम करना चाहिए।
सीमा से अधिक व्यायाम के दुष्परिणाम भी होते हैं जो निम्नवत हैं:-
१. तृषा(प्यास की अधिकता)
२. प्रतमक श्वास
३. कास (खाँसी)
४. थकावट
५. मानसिक अवसाद
६. छर्दी(उल्टी होना)
७. रक्तपित्त (नाक, मुँह, मूत्र, योनि अथवा गुद मार्ग से पित्त दूषित रक्त का स्राव होना)
८. ज्वर (fever) तथा
९. शोष (T. B.) तक हो सकता है।
अतः कभी भी सीमा से अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए।
सावधान:- बहुत छोटे बच्चों, अति वृद्ध, अजीर्ण और वात व्याधि से पीड़ित को व्यायाम नहीं करना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के संदर्भ में नवम बिंदु *स्नान* पर विचार प्रस्तुत है।

तन (शरीर) की शुद्धि के लिए प्रतिदिन स्वच्छ जल से स्नान करना चाहिए। स्नान बहती नदी, तालाब, झरने, कुआँ, ट्यूबवेल आदि पर करना चाहिए। नदी-तालाब में स्नान करने वाले को तैरना भी स्वास्थकर होता है। इसमें देह शुद्धि के साथ व्यायाम भी हो जाता है। आजकल घर पर ही स्नानगृह में स्नान करने की परम्परा है। स्नान का महत्व इस कथन से सिद्ध होता है कि- *हजार कार्य छोड़कर पहले स्नान करना चाहिए।* यह हमारे शास्त्रों का कहना है।
*स्नान विधि*:-
कभी भी पूर्ण नग्न होकर स्नान नहीं किया जाना चाहिये।
स्नान में क्रमशः पैर, हाथ, मुख के बाद शिर पर जल डालना चाहिये।
स्नान पूर्वाभिमुख होकर करना चाहिए।
स्नान के लिए सामान्यतः ठंडे जल का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए हितकर होता है।
शीत ऋतु तथा वात - कफ विकार मे किंचित उष्ण जल का प्रयोग किया जाना चाहिए।
किसी भी स्थिति में शिर पर अधिक उष्ण जल का प्रयोग अहितकर होता है।
शरीर के मैल और पसीने की दुर्गंध को दूर करने के लिए उबटन अथवा साबुन से स्नान करना चाहिए।
स्नान के बाद साफ और स्वच्छ तौलिया से शिर तथा शरीर को अच्छी तरह पोंछ कर साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए।
प्रतिदिन स्नान करने से निम्न लाभ होता है:-
१. शरीर का मैल और पसीने की दुर्गन्ध दूर होकर त्वचा साफ और स्वच्छ होती है।
२. स्नान करने से थकावट दूर हो कर ताजगी महसूस होती है।
३. स्नान करने से तन्द्रा (आलस्य), दाह और तृषा (प्यास) दूर होती है।
४. स्नान करने से अग्नि दीप्त होती है। यही कारण है कि स्नान के बाद भूख लगती है।
५. स्नान से वीर्य, ओज और आयु की वृद्वि होती है।
सावधान:- ज्वर, प्रतिश्याय (जुकाम), अजीर्ण, अतिसार, कर्ण तथा नेत्र रोगी को स्नान नहीं करना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के संदर्भ में दशम बिंदु *ध्यान* पर विचार प्रस्तुत है

जैसे स्नान से तन (शरीर) की शुद्धि होती है वैसे ही ध्यान से मन शुद्ध होता है। स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए तन की शुद्धि की तरह मन की शुद्धि अत्यंत आवश्यक है बल्कि अधिक महत्वपूर्ण है। वास्तव में चंचल मन को स्थिर (एकाग्र) करने की प्रक्रिया का नाम है - *ध्यान* जो एक जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए सतत अभ्यास (प्रैक्टिस) और वैराग्य (विषयों के प्रति विरक्ति भाव उत्पन्न करना) की आवश्यकता होती है। निरन्तर ध्यान से ही क्रमशः धारणा और समाधि (ब्रह्म प्राप्ति) की अवस्था प्राप्त की जा सकती है जो मानव जीवन का परम लक्ष्य है।
स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर ध्यान करने से पूर्व मस्तक पर भ्रूमध्य में नाक के ऊपर अपनी रुचि (पसन्द) के अनुसार चन्दन-रोली का तिलक लगाएं, इससे आज्ञा चक्र सक्रिय और पाँचो ज्ञानेन्द्रियाँ सशक्त बनती हैं। इसके बाद ऊर्जा के स्रोत प्रत्यक्ष देव भगवान भास्कर को ताम्रपात्र में पवित्र जल और लाल फूल से अर्ध्य देकर नमन करें। अपने इष्टदेव की पूजा-अर्चना ध्यान करें।
नियमित ध्यान से निम्नलिखित लाभ होते हैं-
१. मन की चंचलता दूर होती है।
२. मन में संकल्प शक्ति का विकास होता है।
३. कठिन समय में भी मन विचलित नहीं होता है।
४. धैर्यवान होने से प्रज्ञापराध (अहित आहार- विहार) नहीं करता।
५. संयमित जीवन होने से व्यक्ति स्वस्थ, दीर्घायु, बलवान, ओजस्वी, तेजस्वी और यशस्वी होता है।
अतः नित्य ईश्वर आराधना और ध्यान करना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के सन्दर्भ में स्नान-ध्यान के बाद ग्याहरवें बिंदु *जलपान (break fast)* पर विचार प्रस्तुत है।

यों तो पहले ही "स्वस्थदीर्घ जीवन के तीन आधार-आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य।" शीर्षक के अंतर्गत आहार सम्बन्धी विस्तृत विवेचना की जा चुकी है फिर भी यहाँ जलपान/नाश्ता (break fast) पर विशेष विचार प्रस्तुत है।
जैसा कि हम जानते हैं कि आहार प्राणियों की प्रथम और अनिवार्य आवश्यकता है। रात्रि में सात-आठ घण्टे शयन के बाद प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में जागने से लेकर स्नान-ध्यान तक की दिनचर्या का पालन करने के बाद स्वभाविक भूख उत्पन्न होती है अतः आहार के अंतर्गत जलपान (break fast) और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
जलपान के सन्दर्भ में निम्न तथ्य विचारणीय हैं-
१. यदि पूर्व रात्रि में किया गया भोजन ठीक से पाचित हो गया है और मलमूत्रादि विसर्जन सम्यक हुआ है तो ऐसी स्थिति में स्नान-ध्यान के बाद स्वाभाविक भूख लगती है, अतः प्रात ८ बजे से ९ बजे के मध्य जलपान (break fast) करना चाहिए।
२. चूंकि दिन में शारीरिक और मानसिक सक्रियता अधिक होती है जिसके लिए कैलोरी युक्त पौष्टिक आहार जरुरी है अतः ब्रेकफास्ट/नाश्ता तदनुरूप लेना चाहिए। कहा गया है कि *जलपान (break fast) राजा की तरह* करना चाहिए।
३. जलपान में मौसमी फलों, अँकुरित मूंग चना, फलों का रस लेना चाहिये।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के सन्दर्भ में द्वादश बिन्दु *जीवनयापन हेतु कर्म* की विवेचना प्रस्तुत है।

जीवनयापन हेतु कर्म से अभिप्राय है कि जीवन की मूल आवश्यकताओं आहार, वस्त्र और आवास (रोटी -कपड़ा -मकान) के साथ अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिये धन की जरुरत होती हैं।
धनार्जन के लिए कर्म करना पड़ता है अतः दिनचर्या में कुछ समय जीविकोपार्जन के लिये निर्धारण करना चाहिए।
बिना अर्थ (धन) के जीवन व्यर्थ है। दरिद्रता को अभिशाप कहा गया है इसीलिये मनुष्य की मुख्य तीन एषणाओं (इच्छाओं) में प्राणेषणा के बाद दूसरे स्थान पर धनएषणा कही गई है।
धनार्जन के लिए शास्त्रों में कृषि (खेती करना), गौ आदि पशुपालन, वाणिज्य (विभिन्न व्यापार के कार्य) तथा सेवा (नौकरी करना) आदि कार्य बताये गए हैं।
यहाँ विचारणीय पहलु यह है कि जीविकोपार्जन के लिये हम जो भी कार्य करें उसे पूरी ईमानदारी, मेहनत और लगन से करना चाहिए। इस तरह से अर्जित धन जीवन में सुख, शान्ति और समृद्धि प्रदान करता है। इसके विपरीत बेईमानी, मक्कारी और अनैतिक कार्यों से प्राप्त धन जीवन को नरक बना देता है।
अतः सदैव अर्जित धन की शुचिता को महत्व दिया जाना चाहिये।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के संदर्भ में बिंदु क्रमांक १३, १४ और १५ क्रमशः मध्याह्न भोजन (lunch), सायंकालीन भोजन (dinner) और रात्रिशयन से पहले गोदुग्धपान अर्थात तीनों ही आहार से सम्बंधित हैं जिन पर पूर्व में ही "स्वस्थदीर्घ जीवन के तीन आधार-आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य " शीर्षक से आहार के अन्तर्गत विस्तृत चर्चा की गई है। उपरोक्त तीनों बिंदु से सम्बंधित मुख्य तथ्यों पर पुनः प्रकाश डाला जा रहा है।
*मध्याह्न भोजन* (Lunch) से संबंधित मुख्य तथ्य:-
१. मध्याह्न भोजन का उपयुक्त काल दिन १२ बजे से दिन १ बजे के मध्य है अतः यथासंभव इस बीच लंच कर लेना चाहिए।
२. लंच में सर्वप्रथम अल्प मात्रा में अदरक और सेंधा नमक खावें। इसके बाद यथारुचि खीरा, मूली , गाजर, चुकन्दर तथा प्याज की सलाद खावें।
३. सलाद खाने के बाद भूख के अनुसार चावल-दाल, रोटी सब्जी लेवें।
कभी भी अपक्व सलाद और पक्व भोजन को मिश्रित कर नहीं खाना चाहिए। यह विरुद्ध आहार है।
४. भोजन के बाद में ताजा गोदधि से बने तक्र का सेवन अवश्य करें। यह अमृत तुल्य होता है।
५. भोजन के समय यथासंभव जल का सेवन नहीं करें। भोजन करने के आधे घंटे बाद सीमित मात्रा में जल का सेवन करें।
६. लंच के बाद लघुशंका (मूत्र त्याग) कर बायें करवट में कुछ समय विश्राम करें।
७. मध्याह्न भोजन (Lunch) अमीर आदमी (Rich person) की तरह करें अर्थात यथेष्ट मात्रा में पौष्टिक आहार लेवें।
*रात्रि भोजन* (Dinner) से संबंधित मुख्य तथ्य:-
१. रात्रि भोजन (Dinner) यथा संभव सूर्यास्त से पहले करना सर्वोत्तम होता है।
२. यदि सूर्यास्त से पहले संभव न हो तो सन्ध्या ६ - ७ बजे के मध्य अवश्य कर लेना चाहिए।
३. रात्रि भोजन में सलाद नहीं खाना चाहिए।
४. रात में दही नहीं खाना चाहिए।दही आभिष्यंदि होने से रात में सेवन करने से कफ के रोग होते हैं। यदि रात में दही खाने की इच्छा हो तो उसमें नमक, चीनी, गुड़ अथवा शहद मिलाकर खाना चाहिए।
५. रात्रि भोजन के बाद लघुशंका (मूत्र त्याग) करके लगभग एक किलोमीटर अथवा १५-२०मिनट टहलना चाहिये।
६. रात्रि भोजन हल्का और सुपाच्य लेना चाहिए ताकि रात्रि विश्राम में कोई व्यवधान न हो। कहा भी है-"रात्रि भोजन गरीब आदमी अथवा भिखारी की तरह होना चाहिये।"
*रात सोने* से पहले गर्म गोदुग्ध पीने के मुख्य तथ्य:-
१. गोदुग्ध अपने में एक पूर्ण सन्तुलित आहार है।
२. रात सोते समय दुग्धपान से दिन भर की शारीरिक थकावट मिटती है।
३. रात में दुग्धपान से मानसिक तनाव दूर होता है फलस्वरूप नींद अच्छी आती है। अतः रात्रि शयन से पहले गोदुग्ध पीना स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभ कर है।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए दिनचर्या के सन्दर्भ में १६वें बिंदु *रात्रि शयन* पर पूर्व में "स्वस्थदीर्घ जीवन के तीन आधार-आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य" शीर्षक के अंतर्गत निद्रा विषय पर विस्तृत विवेचना की गई है। जैसे:-निद्रा का उचित काल (समय), निद्रा की विधि, निद्रा का उचित परिमाण (समयावधि) और सम्यक निद्रा का परिणाम (लाभ) आदि।
पुनः रात्रि शयन से संबन्धी मुख्य तथ्यों की चर्चा की जा रही है:-
१. यों तो रात्रि शयन रात्रिचर्या का विषय है किंतु एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के मध्य समय को भारतीय संस्कृति में एक दिन से (सोमवार मंगलवार...…) अभिप्रेत है अतः रात्रिशयन को दिनचर्या के अंतिम बिंदु के रूप में चर्चा करना कोई विरोधाभास नहीं है।
२. रात्रि शयन करने का उचित समय सामान्यतः सूर्यास्त के एक प्रहर (३ घण्टे) बाद का है। अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से रात ९ से १० बजे के अंदर निश्चित तौर पर सो जाना चाहिए। कहा भी गया है- *Early to bed and early to rise, makes a man healthy, weathly and wise.*
३. अकारण रात में देर तक जागने से वात प्रकोप होकर वात रोग, अजीर्ण, कोष्ठबद्धता (constipation), और मनोरोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
४. रात में सोने से पहले मुंह और हाथ- पैरों को ठीक से धो- पोंछ कर सोना चाहिए।
५. रात में शयन के समय स्वछ- साफ, हल्के और ढीले वस्त्र धारण करना स्वास्थ्यकर है।
६.रात्रि शयन के समय अपने इष्टदेव का शुद्ध अन्तःकरण से स्मरण एवं ध्यान करें। यदि दिन में जाने-अनजाने आपसे कोई भूल हुई है तो उसके लिये प्रायश्चित करें और आगे भविष्य में वैसी भूल नहीं करने का संकल्प लें।ऐसा करने से मन का बोझ हल्का होकर गहरी नींद आने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
७. सामान्यतः ७-८ घण्टे की नींद सुखदायक (आरोग्यकर) होती है। इससे बहुत कम, बहुत ज्यादा अथवा असमय सोना विभन्न रोगों की उत्पत्ति का कारण हो सकता है, अतः इससे बचें।
प्रकृति ने रात सोने के लिए बनाई है अतः इसका शयन मे समुचित उपयोग करें।

24/01/2026

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए संतुलित आहार के बाद प्रणियों के लिए *सम्यक निद्रा* अतिआवश्यक है।
दिन भर की भाग- दौड़ एवं जीवनयापन के लिए किए गए श्रम से मन एवं शरीर दोनो थक जाते हैं , ऐसी स्तिथि में सम्यक निद्रा के उपरांत ही पुनः शरीर एवं मन क्रियाशील हो पाते हैं। रात्रि में समय से उचित मात्रा में ली गयी निद्रा प्रातः उठने पर व्यक्ति को शरीर और मन से स्फूर्तिवान बनाती है। जबकि इसके विपरीत स्तिथि में ली गयी निद्रा से व्यक्ति थका हुआ अनुभव करता है अतः सामान्य जन को रात्रि 9 से 10 बजे के मध्य सो जाना चाहिए और लगभग 8 घंटे की निद्रा के बाद प्रातः 5 से 6 बजे के मध्य अवश्य जाग जाना चाहिए।
इस संदर्भ में आयुर्वेद का मत है कि ब्रह्म मुहूर्त में निश्चित रूप से जाग जाना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त लगभग सूर्योदय से 1 घंटे पूर्व तक का काल है|

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए सन्तुलित आहार के साथ ही सम्यक निद्रा का महत्व इसके निम्नलिखित लाभ से स्पष्ट है:-
(1) समुचित नींद स्वास्थ्यदायक होती है।
(2) समुचित नींद से धातुओं का पोषण ठीक से होकर शरीर सुडौल बनता है।
(3) शरीर बल की बृद्धि होती है।
(4) सम्यक नींद से प्रजनन क्षमता बढ़ती है।
(5) सम्यक नींद से मेधाशक्ति का विकास होने से ब्यक्ति ज्ञानवान होता है।
(6) समुचित नींद से ब्यक्ति दीर्घायु होता है।
इसके विपरीत अनिद्रा, अल्प निद्रा, अति निद्रा और अकाल निद्रा ( असमय सोने ) से परिणाम भी उपरोक्त 6 बिंदुओं से विपरीत होते हैं।
अतः रात्रि में समुचित नींद लेनी चाहिए।देर रात तक जागने से वायु की वृद्धि होकर वात रोग होने की सम्भावना होती है,जबकि ग्रीष्मकाल को छोड़कर अन्य ऋतु में दिन में सोने से कफ की बृद्धि होकर कफजन्य रोग होते हैं।
_नोट_ :- ग्रीष्म ऋतु में रात्रि छोटी और दिन बड़े होने के कारण दिन में थोड़े समय के लिए शयन किया जा सकता है।

*स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन* के लिए *निद्रा* का महत्व एवं सम्यक निद्रा के लाभ की चर्चा के उपरांत शयन का स्थान एवं विधि की चर्चा भी अपेक्षित है।
१. शयन का कमरा पर्याप्त हवादार ( _ventilated_ ) एवं साफ सुथरा होना चाहिये।
२. कमरे में हल्की रोशनी की व्यवस्था होनी चाहिए।
३. शयन के लिए पलंग लकड़ी का होना चाहिए, यदि लोहे आदि का पलंग हो तो उसके पायों में लकड़ी अथवा rubber का कुचालक ( _cover_ ) होना चाहिए।
४. पलंग के सिरहाने, टेबल पर पानी से भरा पात्र होना चाहिए।
५. पलंग पर स्वच्छ, नरम, और ऋतु अनुकूल बिछावन होना चाहिए।
६. मच्छरों एवं अन्य जंतुओं से बचाव के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करें।
७. शयन करने वाला व्यक्ति सोने से पूर्व अपने मुंह, हाथ एवं पैरों को अच्छी प्रकार धो-पोंछकर एवं अपने इष्ट देवताओं का ध्यान कर शांतचित्त होकर शयन करे।
८. सोने वाले व्यक्ति का शिर पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रखकर सोना शुभ होता है। ऋषि मार्कण्डेय के अनुसार पूर्व दिशा में शिर रखकर सोने से धन-धान्य की वृद्धि होती है जबकि दक्षिण दिशा में शिर रखकर सोने से स्वास्थ्य लाभ होता है।

24/01/2026

अब तक की चर्चा में आयुर्वेद के परिचय और प्रयोजन के बाद पुनः स्वस्थ दीर्घायु के लिए आयुर्वेद ही क्यों? इसपर विवेचन प्रस्तुत है।
"स्वस्थ दीर्घायु के लिए आयुर्वेद ही।" के पक्ष में निम्न बिंदु महत्वपूर्ण हैं _
(१) आयुर्वेद समग्र स्वास्थ्य (इंद्रियों सहित शारीरिक,मानसिक, आत्मिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य) की परिकल्पना (सिद्धांत) के साथ ही इसका विज्ञानसम्मत व्यवहारिक(प्रायोगिक) पक्ष भी प्रतुत करता है।यथा _आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य, दिनचर्या, ऋतुचर्या,योग ,आचार रसायन , धारणीय वेग, अधारणीय वेग, षोडश संस्कार एवं उपवास आदि। संक्षेप में आयुर्वेद आचरण आधारित जीवन विज्ञान है।
(२) आयुर्वेद , प्रकृति (nature) के साथ सामंजस्य और अवलोकन(observation) पर आधारित निरापद वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है जो रोगनिवारण के साथ ही पुनः स्वास्थ्य को स्थापित करने सेश्रेष्ठ है।यह त्रिदोष, पंचमहाभूत, षडपदार्थ आदि वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है।
(३) आयुर्वेद शरीर,मन और आत्मा के समग्र चिंतन पर आधारित व्यवस्थित चिकित्सा पद्धति है ,जबकि अन्य लाक्षणिक (symptom) आधारित हैं।
(४) आयुर्वेद , भारतीयजलवायु के अनुकूल जड़ीबूटी पर आधारित निरापद वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है।
(५) आयुर्वेद में वर्णित "रसायन" और "वाजीकरण" इसकी महत्वपूर्ण विधा हैं जो सेवन करने वाले लोगों को पुरुषार्थचतुष्टय(धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) की प्राप्ति में सहायक होते हैं।

स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन के 3 आधार :-

1. _संतुलित आहार_
2. _सम्यक निद्रा_
3. _संयमित ब्रह्मचर्य_

*संतुलित आहार* संबंधित मुख्य 5 बिन्दु-
(1) हित भुक
(2) मितभुक
(3) ऋत भुक
(4) चित भुक
(5) काल भुक

आगे क्रमश:एक- एक की संक्षिप्त विवेचना करते है।

संतुलित आहार के प्रथम बिंदु " *हितभुक* " का अभिप्राय है

कि सभी को सदा-सर्वदा अपने शरीर,मन और आत्मा के अनुकूल हितकर सात्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए, न कि स्वाद के वशीभूत होकर शरीर,मन और आत्मा के स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाले राजसिक और तामसिक आहार। आहार का प्रभाव शारिरिक स्वास्थ्य के साथ ही मन पर भी होता है।इसीलिए कहा भी है-" _आहार शुद्धि-सत्व शुद्धि_ ।" अर्थात सात्विक शुद्ध आहार से सत्व (मन) भी शुद्ध (पवित्र) होता है जिसका अनुकूल प्रभाव आत्मा अर्थात प्राणी के चिंतन, विचार और व्यवहार में परिलक्षित होता है।संक्षेप में" _जैसा खाओ अन्न वैसा हो मन।"_ अब यहाँ आहार शुद्धि के संदर्भ में आहार की भौतिक (कंकर -मिट्टी रहित), रासायनिक (हानिकारक केमिकल्स रहित) शुद्धि के साथ ही उसकी आध्यात्मिक शुद्धि बहुत महत्वपूर्ण है। आहार की आध्यात्मिक शुद्धि का अभिप्राय है कि हमें सदा सर्वदा ईमानदारी और अपनी मेहनत से प्राप्त आहार का सेवन करना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए सन्तुलित आहार के द्वितीय बिंदु' *मितभुक* 'का अर्थ है

सीमित मात्रा में भोजन ग्रहण करना।
सीमित मात्रा का अभिप्राय है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जठराग्नि बल के अनुरूप नियत मात्रा में ही आहार लेना चाहिए। चूंकि ब्यक्तिविशेष की जठराग्नि पृथक-पृथक होती है अतः स्वभाविक तौर पर ब्यक्ति विशेष के लिए आहार मात्रा भी पृथक होती है। इस संदर्भ में आयुर्वेद का मत है कि अपने जठराग्निबल के अनुसार उदर के एक भाग को ठोस आहार, दूसरे भाग को जल आदि तरल पदार्थों से भरकर शेष तीसरे भाग को वायु के सुचारू संचरण( _gaseas exchange_ ) के लिए रखा जाना चाहिए ताकि किया गया भोजन उचित समय में ठीक से पच सके। इसके विपरीत जिह्वा के स्वाद के वशीभूत हो अधिक मात्रा में किया गया भोजन ठीक से न पचकर पाचन शक्ति को कमजोर कर विभिन्न रोगों को उत्पन्न करता है। मितभूक के संदर्भ में आहार द्रब्य के गुण के अनुसार भी विचार किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार गुरु आहार ( _देर से पचने वाले_ )को आधी तृप्ति और लघु आहार ( _ससमय पचनेवाले)_ को पूर्ण तृप्ति किया जा सकता है।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए सन्तुलित आहार सम्बन्धी तृतीय बिंदु ' *ऋतभुक* ' का अभिप्राय है

ऋतु परिवर्तन के साथ आहार में थोड़ा बदलाव करना जो स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए बहुत जरूरी है।इसके निम्न मुख्य कारण हैं:-
(1) ऋतु परिवर्तन से जैसे प्रकृति ( _बाह्य वातावरण_ ) प्रभावित होता है, वैसे ही वात-पित्त-कफ आदि दोष ऋतु प्रभाव से संचय-प्रकोप-प्रशम को प्राप्त कर जठराग्नि को प्रभावित करता है। उदाहरण स्वरूप शीत काल ( _हेमन्त और शिशिर ऋतु_ ) जो नवम्बर से फरवरी तक का समय होता है, में अग्नि बल उत्तम होता है परिणाम स्वरूप इस काल में ग्रहण किया गया थोड़ा गरिष्ठ ( _पौष्टिक_ ) भोजन भी बिना किसी परेशानी के समय से पच जाता है और धातुओं का पोषण भी उचित परिमाण में होकर शारिरिक एवं मानसिक बल सर्वोत्तम होता है, जबकि ग्रीष्म ऋतु में ठीक इसके विपरीत होता है।
(2) ऋतु विशेष में विशेष फलों और सब्जियों का उत्पादन होता है जिनका सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है अतः इन्हें अपने आहार में शामिल करना चाहिए।इसके विपरीत अन्य ऋतुओं में उत्पन्न होने वाले फल-सब्जी आदि जो शीतग्रहों में भंडारण कर रखे जाते हैं उनका सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है अतः उनके सेवन से बचना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए संतुलित आहार सम्बन्धी चतुर्थ बिंदु ' *चित्त भुक* ' बहुत ही महत्वपूर्ण है

जिसका अभिप्राय है कि भोजन चित्त(मन)लगाकर करना चाहिए।इसके लिए आचार्य अग्निवेश ने " _तन्मनाभुंजीत_ "शब्द प्रयुक्त किया है जिसका अर्थ है कि भोजन तन्मय होकर करें अर्थात तन और मन को स्थिर करके भोजन ग्रहण करना चाहिए। ऐसी स्थिति में ग्रहण किये गए आहार का समुचित पाचन-सात्मीकरण-अवशोषण होने से स्वास्थ्य के लिए आवश्यक सप्तधातुओं का उचित परिमाण में निर्माण होता है और मल-मूत्र-स्वेद आदि का निस्सरण भी सम्यक रूप से होता है। इसके विपरीत खड़े-खड़े, चलते-फिरते तन की अस्थिरता में और मन की चंचलता ( _काम, क्रोध,शोक कीस्थिति अथवा टी.वी.देखते हुए, मोबाइल पर बातें करते हुए_ ) भोजन करने से न तो पाचन ठीक से होता है और न ही रसादि धातुओं का निर्माण उचित परिमाण में होता है जो अनेकों रोगों की उत्पत्ति करते हैं। अतः भोजन सदा स्थिर बैठ कर ,मौन होकर पुरे मनोयोग से करना चाहिए। यही चित्त भुक का आशय है। वास्तव में आहार ग्रहण की प्रक्रिया एक " _यज्ञ_ " है। जिस प्रकार हम यज्ञ करते समय हवनकुण्ड में सावधानी से आहुति देते हैं |
उसीप्रकार उदर के जठराग्नि रूप हवन कुंड में आहारग्रास की सावधानी से आहुति देनी चाहिए। अतएव स्वस्थ रहने के लिए हमें आजकल सुविधा के नाम पर प्रचलित स्वरूचि भोज का बहिष्कार करना चाहिए।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए संतुलित आहार सम्बन्धी पंचम बिंदु " *काल भुक* " का अर्थ है - '

प्रतिदिन एक नियत समय पर ही भोजन करना।_ ' निर्धारित समय से बहुत पहले अथवा बहुत देर से भोजन ग्रहण करने से जठराग्नि प्रभावित हो कर पाचन तंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है परिणामस्वरूप पहले पाचन संबंधी अजीर्ण आदि विकार उत्पन्न होते हैं। नियमित ऐसा करने से कालांतर में अन्य भी बहुत से गंभीर रोगों की उत्त्पति होती है। अतः सदा नियमित समय पर ही भोजन करना चाहिए। सामान्य तौर पर भोजन का समय निम्नवत होना स्वास्थ्यकर होता है:-
(1)जलपान ( _break fast_ )-प्रातः 8 बजे से 9 बजे के मध्य ऋतु के अनुसार यथाशक्य फलों का सेवन स्वास्थ्यकर होता है।
(2) मध्यान्ह भोजन ( _lunch_ ) -दोपहर 12 बजे से 1 बजे के मध्य
(3) रात्रि भोजन ( _Dinner_ )-सन्ध्या 6 बजे से 7बजे के मध्य
(4) रात्रि सोते समय 9 बजे से 10 बजे के मध्य केवल गर्म गोदुग्ध का पीना स्वास्थ्यकर होता है।। *नोट* :- एक भुक्त नियम पालन करने वाले अर्थात प्रतिदिन एक समय भोजन करने वाले संयमी व्यक्ति यक्ति के लिए मध्यान्ह 12 बजे से 1 बजे का समय सबसे उपयुक्त है।

स्वस्थदीर्घ जीवन के लिए सन्तुलित आहार सम्बन्धी *पाँच मुख्य बिंदु* - _हित भुक, मित भुक, ऋत भुक, चित्त भुक और काल भुक_ में बताये गये निर्देशों का पूर्ण पालन करने के साथ ही आहार ग्रहण के सम्बन्ध में निम्न नियमों का दृढ़ता से पालन करना नितांत आवश्यक है, अन्यथा स्वस्थदीर्घ जीवन की परिकल्पना बेईमानी ही होगी।
(1) पूर्ण भूख लगने पर ही हितकर आहार सीमित मात्रा में ग्रहण करें

(2)आहार ग्रहण करने से पहले दोनों हाथ, पैर और मुँह को अच्छी तरह से धोना चाहिए अन्यथा समय से मात्रावत लिया गया हितकर आहार भी संक्रमित होकर रोगकारक हो सकता है।

(3) भोजन करने से पहले थोड़ी मात्रा में अदरक और सेंधा नमक चबाकर खाएं इससे पाचक रसों का स्राव ठीक से होकर भोजन का सम्यक पाचन होता है।

(4) भोजन भली प्रकार से चबाकर खाना चाहिए क्योंकि मुँह की लार ( _saliva_ ) में पाये जाने वाले टायलिन से भोजन का पाचन प्रारम्भ हो जाता है और भोजन को निगलने में सुविधा होती है, अन्यथा आगे यह काम आँतों को करना होगा। अतः दाँतो का काम आँतों से न लेवें।

(5) दिन भोजन के बाद थोड़ी देर वाम पार्श्व ( बाँये करवट) लेटना चाहिए।

(6) रात्रि भोजन के बाद लगभग एक किलोमीटर अथवा 20 मिनट टहलना चाहिये।

(7)रात्रि में फलों का सेवन नहीं किया जाना चाहिए।

(8) रात में दही का सेवन नहीं करना चाहिए।यदि करना ही हो तो उसमें शहद /गुड़/नमक मिलाकर खाना चाहिए। स्वास्थ्य के लिए इन नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।

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