shishpal dall

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healthy lifestyle and health advisor

15/02/2025

**"जो लोग राजाओं को ताज पहनाते हैं, वे खुद राजा नहीं दिखते; सावधान रहें!!"**

एक गरीब आदमी ने 40 साल की उम्र में एक किताब लिखी और उसे अपने जन्मदिन पर लॉन्च करने का फैसला किया। उसके पास लॉन्चिंग के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उसने अपने समुदाय के एक करोड़पति से मदद मांगने का फैसला किया।

वह करोड़पति के घर गया और बातचीत के बाद उसने अपनी समस्या बताई। करोड़पति ने उसे एक कागज और कलम निकालने को कहा और कहा, "मैं तुम्हें एक परीक्षा दूंगा। अगर तुम पास हो गए, तो मैं तुम्हें पैसे दूंगा और अगर फेल हो गए, तो भी मैं तुम्हें पैसे दूंगा।"

फिर उसने उस आदमी से 10 लोगों के नाम लिखने को कहा जो उसकी किताब के लॉन्च पर 10 हज़ार रुपये दे सकते हैं। हैरानी की बात यह थी कि वह आदमी 3 नाम भी नहीं लिख पाया।

अब, एक गिलास पानी पीजिए और मैं आपको कुछ बताता हूँ...

**केवल प्रतिभा और कौशल होना ही काफी नहीं है। आपको मूल्यवान रिश्ते बनाने की शक्ति को समझना होगा।**

एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा था, *"आपका नेटवर्क सीधे आपकी नेट वर्थ के समानुपाती होता है।"*

**रिश्ते एक मुद्रा हैं।**
रिश्ते आय का एक स्रोत हैं। जीवन में हर चीज़ रिश्तों के आधार पर ही आगे बढ़ती है।

देखिए, *इस जीवन में कौन आपको पसंद करता है, यह मायने रखता है।*
लोगों को लोगों के माध्यम से ही ऊपर उठाया जाता है।

*हम में से कई लोग प्रतिभाशाली हैं, लेकिन हमारे पास एक ऐसा व्यक्ति नहीं है* जो राजा को बता सके कि एक यूसुफ है जो सपनों का अर्थ बता सकता है।

*इस जीवन में आप किसे जानते हैं, यह बहुत मायने रखता है।* यह मत कहिए कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पड़ता है।

कुछ ऊंचाइयाँ और अवसर आप कभी हासिल नहीं कर पाएंगे, अगर आप *मूल्यवान रिश्ते बनाए रखने की शक्ति* को नहीं समझेंगे।

जब वे कहते हैं, *कभी-कभी मुड़कर अपने पड़ोसी को नमस्ते कहें*, तो आपको पता भी नहीं होता कि आप किससे बात कर रहे हैं।
वह किसी कंपनी का CEO हो सकता है। लेकिन कभी-कभी, *हम लोगों को उनके बाहरी रूप के आधार पर नीचा समझते हैं और गलत निर्णय लेते हैं।*

इस बुद्धिमत्ता को समझें जो मैं आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
जिस व्यक्ति के साथ आप बैठते हैं, या जो सहकर्मी आपको काम पर नीची नज़र से देखते हैं, वे ही आपको आपके भाग्य सहायक तक ले जा सकते हैं, क्योंकि आपको पता नहीं है कि वे किसे जानते हैं।

कभी-कभी, सिर्फ एक सिफारिश आपकी कहानी बदल सकती है।

*जीवन में किसी को भी नीचा न समझें।* आपको एक दिन उनकी जरूरत पड़ सकती है।

कभी-कभी *जो लोग राजाओं को ताज पहनाते हैं, वे खुद राजा नहीं दिखते* और शायद कभी राजा नहीं बनें, लेकिन वे आपको ताज पहनाने में मदद कर सकते हैं।

फिर से,
रिश्तों के दरवाजे को धीरे से बंद करें; हो सकता है कि आपको कल इसकी आवश्यकता पड़े।

कृपया हर छोटे व्यक्ति को महत्व दें, क्योंकि हो सकता है कि वही व्यक्ति आपको ताज पहनाए!

*किसी भी समूह या वातावरण में आपकी पूर्ण भागीदारी भविष्य में उस समूह की आवश्यकता पड़ने पर बहुत कुछ कहेगी।*

**चलो यह न भूलें:
हर कोई एक प्लस है!!**

तरोताजा रहें ✌️

---

यह संदेश हमें याद दिलाता है कि जीवन में रिश्ते और नेटवर्किंग का कितना महत्व है। छोटे-बड़े हर व्यक्ति को महत्व देना चाहिए, क्योंकि कभी-कभी वही लोग हमारे जीवन में बड़े बदलाव ला सकते हैं।

13/12/2024

मत परेशान हो, क्योंकि आमतौर पर...
1. चालीस साल की अवस्था में "उच्च शिक्षित" और "अल्प शिक्षित" एक जैसे ही होते हैं। (क्योंकि अब कहीं इंटरव्यू नहीं देना, डिग्री नहीं दिखानी).
2. पचास साल की अवस्था में "रूप" और "कुरूप" एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते).
3. साठ साल की अवस्था में "उच्च पद" और "निम्न पद" एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है).
4. सत्तर साल की अवस्था में "बड़ा घर" और "छोटा घर" एक जैसे ही होते हैं। (बीमारियाँ और खालीपन आपको एक जगह बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, और आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं).
5. अस्सी साल की अवस्था में आपके पास धन का "कम होना" या "ज्यादा होना" एक जैसे ही होते हैं। (अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है).
6. नब्बे साल की अवस्था में "सोना" और "जागना" एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है).
जीवन को सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें.
आगे चल कर एक दिन सब की यही स्थिति होनी है, यही जीवन की सच्चाई है...
चैन से जीने के लिए चार रोटी और दो कपड़े काफ़ी हैं... पर ,बेचैनी से जीने के लिए चार गाड़ी, दो बंगले और तीन प्लॉट भी कम हैं !!

09/09/2024

100 साल से ज्यादा एक मलिक बर्दाश्त नहीं करती जमीन....

जब ये मकान बनना शुरू हुआ होगा तो घर वालों ने कितने शौक से बनाया होगा कितनी शिद्दत से इसकी सजावट की होगी । बीवी कहती होगी यहां ये डिज़ाइन बनाना है यहां पर ये दरवाज़ा लगना हैं और यहाँ पर ऐसी खिड़की रखनी है.
आह चले गए ना सब. यहां से सब को जाना है
ज़मीन और मकान के लिए न लड़ा करो मालिको । ज़मीन 100 साल से ऊपर एक मालिक बर्दाश्त नहीं करती है।
मालिक बदलते रहते हैं कमाई की हद तय करो
जीना सीखो एक उम्र के बाद अपनी मर्जी से कही जा भी नही सकोगे। आज खुद के लिए वक्त नहीं निकलता कल कही गिर ना जाओ कही खो ना जाओ नही पापा वहां नही जाना है आकर बीमार पड़ जाओगे। बच्चे भी फिर बहाना लगा देंगे । और अगर गलती से जिद्द कर कर चले भी गए और कही चोट लग गई या बीमार पड गए तो वही बच्चे बहू सो ताने देने लगेंगे हमने तो पहले ही रोका था अब कौन करेगा इनका । बच्चे देखे या इन्हें। अगली बार से ऐसे करेंगे तो मैं नही करूंगी करके बहू भी पल्ला झाड़ लेगी।
जब तक जियो जी भर कर जियो। क्योंकि जिनके लिए जोड़ रहे हो कल वही तुम्हे आराम नही करने देंगे।
उनसे पूछ कर आराम करना होगा।
ये दुनियां एक नाटक है अपना किरदार निभाते चलो तुम इस नाटक का हिस्सा भर हो ।
किसी बेतहाशा कमाने वाले से उसके अंतिम दिनों के समय पूछना क्या मिला जोड़ते जोड़ते सपने मारते मारते जीकर।
वो कहेगा तजुर्बा यही कहता है खुद से_पूछ कर करता हूं तो "ना" मिलती है
ना पूछ कर कर दूं तो मानते नही हो आप ही का ताना।।
ये बाते आम हो जाती है एक उम्र के बाद।

05/03/2024

मेरे साथ पढ़ने वाला एक मित्र अचानक से दुबई चला गया और लौट के आया 5 साल बाद हालाकि फेसबुक पर लगभग रोज बात होती रहती थी
फिर भी 5 साल बाद जब वह वापस आया तो हम सभी मित्र मंडली ने उससे पूछा
और बताओ कैसी है अरब की जिंदगी, उसने जो जवाब दिया उसी के भाषा और लहजे में आपके सामने रख रहा हूं

पांच साल हो गये थे सऊदी में काम करते हुए पहला एक साल कर्ज़ उतारना दूसरा तीसरे साल की कमाई बहनों की शादियों की भेंट चढ़ गया । चौथे साल कुछ बचत करके आने की सोचा तो अब्बा की तबियत खराब हो गई फिर नहीं आ सका और अब्बा गुज़र भी गये बूढ़ी अम्मा घर पर अकेली थी लेकिन कोई बचत नहीं तो हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी ।

पांच साल सऊदी में रहने के बाद खाली हाथ घर जाऊं लेकिन अम्मा की ज़िद और बहनों ने भी कहा भैया आ जाओ हमें कुछ नहीं चाइये बस आ जाओ.

कहा तो हिम्मत बढ़ी।कुछ उधार बारी करके टिकट लेके वापस आगया की कोई बड़ी ज़िम्मेदारी तो है नहीं अब यहीं कुछ कर लेंगे ।

आने के दूसरे दिन बहन से मिलने गया बहन भी अब बच्चों वाली हो चुकी थी आते वक्त भांजों के हाथ पर सौ रूपया रख कर वापस हुवा ।

दूसरी बहन के यहाँ पहुंचने पर पास के पैसे भी खत्म हो चुके थे लेकिन उसे ये उम्मीद थी ये बहन जो कुछ ज़्यादा नज़दीक है कुछ नहीं बोलेगी ।

वहां से वापसी होने पर भांजे के हाथ पर कुछ नहीं रख पाया घर पहुंचने पर अम्मा ने बताया की इक बहन का फोन आया था बोली भाई पांच साल बाद सऊदी से आया था मेरे बच्चों के हाथों पर सौ रूपल्ली रख के गया इतना तो हम फकीरों को दे देते हैं।

दूसरी बहन बोली की पांच साल बाद सऊदी से आया था अगर बच्चों के हाथ पर 10 रुपये भी रख देता तो बच्चें कहते मामू आये थे.

लेकिन मेरी नाक कटा दी ससुराल में खाली हाथ चले गये। मैं अब वहां खड़ा अपने पिछले 5 सालों की कमाई का हिसाब लगा रहा था।
ये सिर्फ एक आदमी की बात नही है बल्कि पैसे कमाने वाले ज्यादातर आदमियों का यही हाल है
आप पैसे कमा रहे हो तो आप को सब कुछ मिलेगा मान सम्मान लेकिन किसी कारण वश आज आप नही कमा रहे तो अब किया मिट्टी में मिल जाता है

13/01/2024

मांस का मूल्य

मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा :

देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए

सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?

मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा :
राजन,

सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है,

इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।

तब सम्राट ने उनसे पूछा :
आपका इस बारे में क्या मत है ?

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा :
शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय 💓 का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और

उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और

सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख
दीं ।

सम्राट ने पूछा :
यह सब क्या है ?
तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए

इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला ।

राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वो अपनी जान बचाने मे असमर्थ है।

और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि ।

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं ।

तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

शुद्ध आहार, शाकाहार !
मानव आहार, शाकाहार !

अगर ये लेख आपको अच्छा लगे तो हर व्यक्ति तक जरुर भेजे।

03/07/2023

देनहार कोई और है, कर कर लंबे हाथ🙏

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से
दूसरे शहर जाने के लिए निकली,
मैं रेलवे स्टेशन पहुंची ,

पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी,
मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था,
मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए,
बहुत जोर की भूख लगी थी
मैं होटल की ओर जा रही थी।

अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे
दो बच्चों पर पड़ी,
दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे
बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी।
कमजोरी के कारण अस्थिपिंजर
साफ दिखाई दे रहे थे,
वे भूखे लग रहे थे।

छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था,
बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था,
मैं अचानक रुक गई दौड़ती भागती जिंदगी में
पैर ठहर से गये।

उनको को देख मेरा मन भर आया ,
सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए,
मैंने उन्हें ५ रु दे कर आगे बढ़ गई।
तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितनी कंजूस हूं मैं,
५ रु क्या खाएंगे ये चाय तक ढंग से न मिलेगी,
स्वयं पर शर्म आयी और वापस लौटी।

मैंने बच्चों से कहा,कुछ खाओगे ?
बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा
बेटा मैं नाश्ता करने जा रही हूं,
तुम भी कर लो,
वे दोनों भूख थे तुरंत तैयार हो गए।

उनके कपड़े गंदे होने के कारण होटल वाले ने
उनको डांट दिया और भगाने लगा,
मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है
वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगी।

होटल वाले ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा..
उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए
शर्म साफ दिखाई दी।
बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी।
सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को
लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे,
उनके चेहरे की ख़ुशी देखने वाली थी,

मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना।
और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर निकल गई।

वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे।
मैं स्टेशन की ओर निकली, थोडा मन भारी लग रहा था मन उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था।
रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा ,"हे भगवान," आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख देख आप कैसे चुप बैठ सकते है।
दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया,

पुत्री अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था?
क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया।
मैं स्तब्ध हो गई, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए
ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो।
मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र है,
उसकी लीला अपरंपार है,

भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है
जब वह हमे उस काम के लायक समझता है,
किसी की मदद को मना करना वैसा ही है
जैसे भगवान के काम को मना करना।
खुद में ईश्वर को देखना ही ध्यान है,
दुसरो में ईश्वर को देखना प्रेम है,
ईश्वर को सब में और सब में ईश्वर को देखना ज्ञान है

13/03/2023

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